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धर्मचंद यादव, संपादक – करंट न्यूज़। 

लोकतंत्र में जिसे जनता “माननीय” कहकर संसद भेजती है, उससे उम्मीद सम्मान, संयम और जिम्मेदारी की होती है। लेकिन जब यही “माननीय” सत्ता के नशे में आकर देश की बेटियों पर कीचड़ उछाले, तो सवाल उठना लाजमी है।

*सांसद के तौर पर कंगना रनौत ने जिस तरह जंतर मंतर पर आंदोलनरत खासकर लड़कियों के लिए अमर्यादित और अभद्र भाषा का प्रयोग किया है, वह किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। यह टिप्पणी न सिर्फ असंसदीय है, बल्कि पूरी तरह असहनीय और शर्मनाक है।*

*जनप्रतिनिधि या जलील करने वाली?

आंदोलन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। जंतर मंतर पर बैठी बेटियां न्याय की मांग कर रही थीं, अपनी आवाज़ बुलंद कर रही थीं। ऐसे में एक सांसद का उन बेटियों के चरित्र और संघर्ष पर सवाल उठाना, उन्हें अपशब्द कहना, यह दर्शाता है कि सत्ता मिलते ही कुछ लोग जमीन से कितने दूर हो जाते हैं।

*पद की गरिमा सर्वोपरि

जनता ने जिसे “माननीय” कहकर चुना है, उससे अपेक्षा भी यही है कि वह विवादों में नहीं, समाधान में विश्वास रखे। भाषा से ही नेता की पहचान बनती है। तल्खी से शायद कुछ समय के लिए सुर्खियां मिल जाएं, लेकिन लंबे समय में विश्वास और सम्मान ही जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी पूंजी है।

सांसद का पद शोहरत और स्टारडम चमकाने के लिए नहीं होता। वह कुर्सी जनता की पीड़ा सुनने और उसका समाधान करने के लिए है। लेकिन यहां भाषा की मर्यादा इतनी गिरी कि फिल्मी स्क्रिप्ट की अकड़ को संसद की गरिमा पर थोप दिया गया।

*कंगना रनौत की यह टिप्पणी पूरी तरह अभद्र है।* एक महिला होकर दूसरी महिलाओं के आंदोलन का इस तरह उपहास उड़ाना, उन्हें “इस नाम” और “उस नाम” से नवाजना – यह नारी शक्ति का अपमान है, हिमाचल की संस्कृति का अपमान है।

*जनता ने चुना है, जनता की अदालत भी वही है

जनप्रतिनिधि और अभिनेता के काम में बुनियादी फर्क है। एक अभिनेता का काम अभिनय है, संवाद पटकथा के अनुसार होते हैं। लेकिन एक जनप्रतिनिधि का हर शब्द उसकी अपनी सोच, उसके संस्कार और उसके पद की गरिमा को दर्शाता है।

*भाषा तय करती है नेता की हैसियत

नेता की पहचान उसके काम से नहीं, उसकी जुबान से होती है। तीखे सवाल पूछिए, विरोध कीजिए, लेकिन इतनी गिरावट के साथ नहीं कि पूरा सदन और पूरा प्रदेश शर्म से सिर झुका ले।

अगर यही “माननीय” की परिभाषा है, तो जनता को सोचना होगा कि उसने वोट किसे दिया है – एक जनसेवक को या एक ऐसे व्यक्ति को जिसे सत्ता मिलते ही आम जनता तुच्छ लगने लगी।

इसीलिए आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि *क्या एक जनप्रतिनिधि की भाषा उस जनता के प्रति “कंगना रनौत जैसी” हो सकती है, जिसने उसे चुनकर संसद भेजा है?*

*अंतिम बात

संसद मंदिर है और मंदिर में बैठने वाले को मंदिर जैसी मर्यादा रखनी होगी। जंतर मंतर की बेटियों ने देश का नाम रोशन किया, मेडल जीते। उनका अपमान मतलब देश का अपमान है।

*जनता ने जनप्रतिनिधि चुना है, अमर्यादित बयानबाज नहीं।* अगर जुबान पर लगाम नहीं लगी, तो जनता लगाम कसना जानती है।

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