हेमसिंह ठाकुर।
हिमाचल प्रदेश के 148 सरकारी CBSE स्कूलों में 1 अक्टूबर 2026 से लागू किया गया नया ड्रेस कोड निस्संदेह एक सराहनीय पहल है। हल्का लाइलैक, पर्पल और नेवी ब्लू जैसे रंगों का चयन शिक्षकों को एक पेशेवर और गरिमापूर्ण लुक देता है।
अनुशासन और एकरूपता की दृष्टि से यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन इसके व्यावहारिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है।
शिक्षिका ज्ञान के साथ संस्कृति की संवाहक भी
एक महिला शिक्षिका न केवल ज्ञान का संचार करती है, बल्कि अपनी लोक-संस्कृति और परंपराओं की संवाहक भी होती है। हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियां और विविधता ऐसी हैं कि यहाँ की वेशभूषा केवल फैशन नहीं, बल्कि जीवनशैली और ठंड से बचाव का अनिवार्य माध्यम है।
अधिसूचना में दिए गए विकल्पों—जैसे ब्लेजर के साथ साड़ी या पेंट-शर्ट—को अपनाना आधुनिकता की दिशा में एक कदम है। किंतु जब शून्य से नीचे गिरते तापमान में एक शिक्षिका कक्षा में प्रवेश करती है, तो उसके सामने कुछ सहज सवाल और एक हल्की-सी टीस उभरती है।
किन्नौर-लाहौल में शॉल-पट्टू फैशन नहीं, जरूरत
किन्नौर, लाहुल-स्पीति, पांगी, सराज और करसोग जैसे कठोर जलवायु वाले क्षेत्रों में ठंड से निपटने के लिए शॉल, पट्टू या स्वेटर-कोटी कोई ऐच्छिक वस्त्र नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं।
सिरमौर व शिमला, मंडी का ‘धाठू’, किन्नौर की टोपी, कुल्लू का विश्वप्रसिद्ध ‘पट्टू’ और शिमला की पहचान ‘रेजटा’—ये केवल कपड़े नहीं, बल्कि हिमाचली महिलाओं के स्वाभिमान और पहचान का प्रतीक हैं।
जब राज्य की सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी भी शॉल और स्थानीय परिधान सहजता से धारण करती हैं, तो एक शिक्षिका के मन में भी अपनी संस्कृति को ओढ़ने की स्वाभाविक इच्छा होती है।
संस्कृति से दूरी आत्मविश्वास पर असर डालेगी
यदि एक शिक्षिका को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर महसूस हो, तो इसका असर उसके आत्म-विश्वास पर पड़ता है। नियम ऐसे होने चाहिए जो एक शिक्षिका की गरिमा और पेशेवर पहचान को निखारें, न कि उसे अपनी ही माटी के रंगों से अलग करें।
ड्रेस कोड को समावेशी बनाने के लिए 3 सुझाव
प्रशासनिक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए, यदि नए ड्रेस कोड में बिना मूल संरचना को छेड़े कुछ सूक्ष्म संशोधन किए जाएँ, तो यह व्यवस्था और भी समावेशी और व्यावहारिक बन सकती है।
1. पारंपरिक वस्त्रों को रंग-कोड के साथ अनुमति: मुख्य रंग (हल्का लाइलैक, पर्पल और नेवी ब्लू) को यथावत रखते हुए, महिला शिक्षकों को इन्हीं निर्धारित रंगों की हिमाचली शॉल, पट्टू या रेजटा पहनने की छूट दी जा सकती है।
2. शीतकालीन एक्सेसरीज़ पर स्पष्टता: दिसंबर और जनवरी की कड़ाके की ठंड को देखते हुए मफलर, ग्लव्स, स्वेटर, हाफ-स्लीव जैकेट और धाठू/टोपी के उपयोग पर स्पष्ट और व्यावहारिक दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए।
3. क्षेत्रीय विविधता का सम्मान: जनजातीय और अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों (जैसे लाहौल-स्पीति, किन्नौर, सिरमौर, कुल्लू आदि) की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए वहाँ के पारंपरिक पहनावे को ड्रेस कोड का ही एक स्वीकृत हिस्सा माना जाए।
अनुशासन और आधुनिकता तभी पूर्ण रूप से सफल होती है जब उसमें अपनी मिट्टी की महक और व्यावहारिक संवेदना शामिल हो। यदि इस ड्रेस नीति में हिमाचल की समृद्ध परंपराओं का समावेश कर दिया जाए, तो महिला शिक्षिकाओं का आत्म-विश्वास और अधिक बढ़ेगा और वे गर्व के साथ अपनी संस्कृति व कर्तव्य दोनों का निर्वहन कर सकेंगी।
*लेखक हेमसिंह ठाकुर, हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला के गोहर संबंध रखते हैं। पेशे से अधिवक्ता होने के पत्रकारिता व लेखन में भी दक्षता रखते हैं। *