‘पहाड़ की खुशबू अब दुनिया तक पहुंचेगी’: CM सुक्खू ने दी प्रदेशवासियों को बधाई, बोले- कारीगरों-किसानों की बढ़ेगी आय, खुलेंगे रोजगार के द्वार
शिमला, करंट न्यूज़: देवभूमि की मिट्टी की खुशबू और हाथों की कला को अब अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है। हिमाचल प्रदेश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व वाले 8 पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है।
इसमें मंडी की सेपु बड़ी, चंबा का मेटल आर्ट, स्पीति का सी-बकथॉर्न (छरमा), सलूनी सफेद मक्का, सिरमौरी लोइया, किन्नौरी टोपी, किन्नौरी सेब और किन्नौरी आभूषण शामिल हैं।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने इस शानदार उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई दी और इसे *पिछले साढ़े तीन साल के सरकारी प्रयासों का नतीजा* बताया।
*‘ये सिर्फ उत्पाद नहीं, हिमाचल की आत्मा हैं’: CM सुक्खू*
*मुख्यमंत्री ने कहा कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की मौलिकता और पहचान सुरक्षित रहेगी। बाजार में इनकी मांग और मूल्य दोनों बढ़ेंगे। सबसे बड़ी बात, जनजातीय समुदायों, कारीगरों, बुनकरों और किसानों के लिए रोजगार के नए द्वार खुलेंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। यह हमारी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को बचाने के साथ-साथ आर्थिक विकास का भी रास्ता है।”
*किन 8 उत्पादों को मिला ‘GI ताज’?*
*स्पीति का सी-बकथॉर्न (छरमा)* – ‘हिमालयन बेरी’ के नाम से मशहूर, औषधीय गुणों का खजाना है।
*सलूनी की सफेद मक्का* – चंबा के सलूनी क्षेत्र की खास पैदावार है।
*चंबा मेटल आर्ट* – सदियों पुरानी धातु शिल्प कला है।
*सिरमौरी लोइया* – सिरमौर की पारंपरिक ऊनी चादर है।
*किन्नौरी टोपी* – किन्नौर की पहचान, रंग-बिरंगे डिजाइन वाली टोपी।
*मंडी की सेपु बड़ी* – उड़द दाल से बनी पहाड़ी डिश का स्वाद अब दुनिया चखेगी।
*किन्नौरी सेब* – मीठे और रसीले सेबों की अलग पहचान है।
*किन्नौरी आभूषण* – पारंपरिक डिजाइन वाले चांदी-कोरल के गहने हैं।
*अब तक 17 उत्पादों को मिला GI टैग*
*हिमकोस्ट के माध्यम से* इन 8 नए उत्पादों के साथ अब हिमाचल के कुल 17 पारंपरिक उत्पादों को GI पंजीकरण मिल चुका है। पहले से GI टैग प्राप्त उत्पाद में कुल्लू शॉल, कांगड़ा चाय, चंबा रूमाल, किन्नौरी शॉल, कांगड़ा पेंटिंग, हिमाचली काला जीरा, हिमाचली चुल्ली तेल, चंबा चप्पल तथा लाहौली बुने हुए मोजे-दस्ताने शामिल हैं।
*अगले टारगेट: 4 और उत्पाद कतार में*
CM सुक्खू ने बताया कि सरकार 4 और पारंपरिक उत्पादों को GI टैग दिलाने में जुटी है। जिसमें *पांगी का भोट जौ* – चंबा जिले के पांगी क्षेत्र का खास जौ, *चंबा चुख* पारंपरिक पहाड़ी चटनी,*भरमौर का प्लेक्ट्रेंथस शहद* भरमौर क्षेत्र का दुर्लभ शहद व *सिरमौर का अदरक* सिरमौर जिले की खास किस्म शामिल है।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को इनका GI पंजीकरण जल्द करवाने के निर्देश दिए हैं।
*‘नकली से सुरक्षा, ब्रांड को मजबूती’: सुशील सिंगला*
पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव सुशील कुमार सिंगला ने कहा कि GI पंजीकरण इन उत्पादों को नकली और अनधिकृत उपयोग से बचाएगा। इससे ब्रांड पहचान मजबूत होगी, बाजार में स्वीकार्यता बढ़ेगी और निर्यात की संभावनाएं भी खुलेंगी।
इस अवसर पर डॉ. मनमोहन सिंह हिमाचल प्रदेश लोक प्रशासन संस्थान की निदेशक डॉ. रूपाली ठाकुर तथा हिमकोस्ट के सदस्य सचिव डॉ. सुरेश अत्री भी मौजूद रहे।
*खास बात:* GI टैग का मतलब है कि *अब ‘किन्नौरी सेब’ सिर्फ किन्नौर में पैदा होने वाले सेब को ही कहा जा सकेगा*। इसी तरह *मंडी की सेपु बड़ी* के नाम पर कोई और मिलावटी प्रोडक्ट नहीं बेच पाएगा। “पहाड़ का असली स्वाद, असली कला” अब सिर्फ हिमाचल के नाम ही रहेगी।