मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा।
भाजपा नेताओं द्वारा आरडीजी पर उठी चिंता को “रोना-धोना” कहकर खारिज करना और साथ ही केवल “फिजूलखर्ची बंद करो” तक बहस को सीमित कर देना आधा सच है—और आधा सच अक्सर सबसे बड़ा गैर-जिम्मेदाराना तर्क होता है।
पाँच वर्षों में लगभग 39,000 करोड़ रुपये की संभावित राजस्व घाटा अनुदान का लुप्त हो जाना कोई भावनात्मक विलाप का विषय नहीं, बल्कि ठोस वित्तीय झटका है। इसे शाब्दिक तंज़ में बदल देना समस्या की गंभीरता को हल्का कर देना है।
हां, यह भी उतना ही सत्य है कि “फिजूलखर्ची बंद करो” कोई हल्की या असंगत सलाह नहीं, बल्कि एक सधी और सुलझी हुई राजनीतिक-प्रशासनिक कसौटी है—जिसे सत्ता पक्ष को हाथों-हाथ लेना चाहिए। पर यह सलाह तब सीमित हो जाती है जब पूरा विमर्श कुछ कृपाभोग पदों के वेतन-भत्तों की गणना तक सिमट जाता है। सच यह है कि इन पदों पर होने वाला व्यय 39,000 करोड़ के संभावित राजकोषीय शून्य के सामने ऊँट के मुंह में जीरे से अधिक नहीं।
फिर भी, यही “जीरा” विपक्ष व आलोचकों के तर्क को धार दे देता है। क्योंकि नैतिक बल आंकड़ों की विशालता से नहीं, आचरण की सादगी से आता है। कृपाभोगियों के वेतन-भत्तों का प्रश्न भले राजकोषीय संकट का समाधान न हो, पर वह सार्वजनिक विश्वास का दर्पण अवश्य है। यदि कृपा भोगी इस प्रतीकात्मक आयाम को समझे और हिमाचल हित में संयम, पारदर्शिता और आत्मानुशासन की दिशा में ठोस कदम उठाए, तो वह न केवल विपक्ष व आलोचकों के तर्क की धार कुंद कर सकता है, बल्कि 39,000 करोड़ की बहस को नैतिक ऊंचाई भी दे सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ वित्तीय यथार्थ और राजनीतिक शुचिता मिलकर पूरी खबर की प्राणवायु बन सकते हैं।
2026–27 के बजट दस्तावेज़ से आरडीजी के ओझल होते ही हिमाचल के घरों में चूल्हे भले पहले की तरह जले हों, पर राजनीति की आंच अचानक तेज़ हो गई। धुआं अब रसोई से कम, बयानबाज़ी से अधिक उठ रहा है। अल्प-संसाधन राज्य होने के कारण यहां हजारों परिवारों की आजीविका सरकारी वेतन और पेंशन पर टिकी है—दवा-दारू का भरोसा भी उसी पर, बच्चों की पढ़ाई का संबल भी वही।
पांचवें से पंद्रहवें वित्त आयोग तक राजस्व घाटा अनुदान एक स्थिर आर्थिक सहारे की तरह मिलता रहा। अब जब सोलहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद वह सहारा बजट पन्नों से ओझल हुआ, तो जो लौ भड़की, वह जनचिंता से कम और सियासी आरोप-प्रत्यारोप से अधिक प्रज्वलित दिखाई दी।
बीते दिन हिमाचल प्रदेश विधानसभा में यही लौ मैराथन बहस में बदल गई। संसदीय कार्य मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने नियम 102 के तहत सरकारी संकल्प प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह मुद्दा किसी दल का नहीं, प्रदेश की 75 लाख आबादी के हितों का है। उनका तर्क था कि जीएसटी मुआवज़ा पहले ही बंद हो चुका है, केंद्रीय करों में हिस्सा सीमित है।
अब आरडीजी भी समाप्त—ऐसे में आर्थिक संतुलन डगमगा गया है। उन्होंने इसे संवैधानिक अधिकार का प्रश्न बताया और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 275 तथा भारतीय संविधान का अनुच्छेद 280 का हवाला देते हुए केंद्र से पूर्ववत सहायता की पुरजोर सिफारिश की मांग दोहराई।
पर विपक्ष ने इस प्रस्ताव को राजनीतिक मंचन करार दिया। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि राज्यपाल के अभिभाषण और बजट चर्चा में यह विषय पहले से निहित है, अलग प्रस्ताव लाकर सरकार मुद्दे का समाधान नहीं, उसका विस्तार कर रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर तीखे प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि सरकार आर्थिक अनुशासन के बजाय छात्र राजनीति की शैली में बयान दे रही है।
फिजूलखर्ची, सलाहकारों और वकीलों पर खर्च, चेयरमैनों के वेतन में वृद्धि और बढ़ते कर्ज का हवाला देते हुए उन्होंने चेताया कि यदि व्यय पर लगाम नहीं लगी तो वेतन, पेंशन और विकास कार्यों पर संकट गहरा सकता है।
भाजपा सदस्य रणधीर शर्मा ने भी इसी सुर में कहा कि आरडीजी का रोना केंद्र से सहायता पाने के लिए नहीं, राजनीतिक लाभ के लिए रोया जा रहा है। उनका तंज साफ था—यदि सरकार नहीं संभलती, तो मैदान खाली करे।
दूसरी ओर, ठियोग के विधायक कुलदीप राठौर ने बहस को प्राकृतिक आपदाओं की पृष्ठभूमि में रखा। 2023 और 2025 की मॉनसून आपदाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिमाचल की तुलना संसाधन-संपन्न राज्यों से नहीं की जा सकती। केंद्र की योजनाओं से मिलने वाला धन कोई उपकार नहीं, संघीय ढांचे में राज्य का अधिकार है।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने सदन में जवाब देते हुए इसे “युद्ध” की तरह लड़ने की बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्थिक दबाव के बावजूद ओल्ड पेंशन स्कीम बंद नहीं होगी और न ही बिजली बोर्ड का निजीकरण किया जाएगा। उनका प्रश्न विपक्ष से सीधा था—क्या वे आरडीजी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री के पास संयुक्त रूप से जाने को तैयार हैं? साथ ही उन्होंने विपक्ष पर चर्चा से भागने का आरोप लगाया।
इसी द्वंद्व के बीच कुछ लोग इसे तंज़ में “राजनीतिक दोहन ग्रांट” कहने लगे हैं—जहां घाटे से अधिक मुनाफ़ा बयानबाज़ी का है, और अनुदान से अधिक मूल्य उसका चुनावी उपयोग।
सदन की बहस ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि आर्थिक चुनौती वास्तविक है, पर उतना ही स्पष्ट यह भी है कि उसके समाधान से पहले उसकी राजनीतिक व्याख्या तय की जा रही है।
इसीलिए सदन के गलियारों में कुछ लोग इसे तंज़ में ‘राजनीतिक दोहन ग्रांट’ कहने लगे हैं—बहस के धुएँ में सुलगता हुआ एक ऐसा मुद्दा, जहां घाटे से अधिक लाभ उसकी राजनीतिक खपत में है।