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गोहर (मंडी) :
आज मैं यह पत्र किसी देवता विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि हमारे देव समाज की उस कड़वी सच्चाई को सामने रखने के लिए लिख रहा हूँ, जिसे हम अक्सर ‘आस्था’ के नाम पर अनदेखा कर देते हैं। हम आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ भक्ति से ज्यादा ‘ठसक’ और श्रद्धा से ज्यादा ‘दिखावा’ हावी हो गया है।

देवी-देवताओं को स्वर्ण आभूषणों से लाद देने से उनकी शक्ति नहीं बढ़ती। शक्ति तो उस निस्वार्थ भाव में है जिससे एक भक्त अपना शीश नवाता है। आज ‘फलाने देवता का सोने का टोप, घाघरा, नौलखा हार’ चांदी के जमाण और ‘फलाने की पांच मंजिला कोठी’ स्वर्ण जड़ित कलश और प्रतिष्ठा पर पचास हजार या एक लाख लोगों की धाम, देख-देखकर जो प्रतिस्पर्धा शुरू हुई है।

उसका सबसे बड़ा बोझ उस गरीब हारू (देवलु) पर पड़ता है जो अपना पेट काटकर, अपनी गाढ़ी कमाई की पोटली से ‘सूंढ़’ (चंदा) देने को मजबूर है। क्या ईश्वर को सोने का टोप उस गरीब की तकलीफ़ से ज्यादा प्यारा है?

विचित्र बात यह है कि आज अधिकांश देव समाज की बागडोर अक्सर उन ‘रिटायरी’ लोगों के हाथ में है, जिन्होंने पूरी उम्र उस श्रद्धा से देवता की सेवा नहीं की, पर अब पद और पैसे के दम पर ‘अगुआ’ बन बैठे हैं।

कुछ जगह तो सरकारी कर्मचारी देवता के मठाधीश बनें बैठे हैं। ये लोग अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए भोले-भाले समाज को नए रथ, नए मंदिर और भव्य निर्माणों के लिए उकसाते रहते हैं। इस अनचाही प्रतिस्पर्धा का परिणाम केवल भव्य इमारतें हैं, आध्यात्मिक शांति नहीं।

याद कीजिए

देवता तब ज्यादा शक्तिशाली और सुलभ थे जब वे किसी पेड़ के नीचे, झुंवड़ में या पहाड़ की चोटी पर एक साधारण पत्थर के रूप में विराजमान थे। वह प्रकृति के संरक्षक थे, हर मुराद पूरी होती थी। तब कोई भेदभाव नहीं था, हर कोई समान था।

मन्नत पूरी होने पर श्रद्धा से ‘लोहे के नसाण’ चढ़ाए जाते थे। आज उन्हीं नसाणों को हेय दृष्टि से देखा जाता है क्योंकि अब जगह केवल सोने-चांदी और दानपात्रों ने ले ली है। जिस कारीगर ने मंदिर बनाया, जो रात-दिन सेवा में जुटा रहा, उसे अक्सर देवता को छूने तक की अनुमति नहीं मिलती, जबकि सोना चांदी मोटी और रकम चढ़ाने वाले ‘श्रेष्ठ भक्त’ घोषित कर दिए जाते हैं।

हमारी युवा पीढ़ी भी इस दिखावे की लहर में बह रही है। जयकारों की गूँज तो है, पर उस गूँज के पीछे ‘सुलफे की टेर’ और नशे का प्रभाव ज्यादा दिखने लगा है।

जब तक उन्हें इस खेल का अहसास होता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है और मठाधीश अपनी पीठ थपथपाकर निकल चुके होते हैं।

देव समाज से कुछ प्रश्न

  • क्या सत्त और तप वाले देवी देवता सोने चांदी के मोहरे या रथ जैसी तड़क-भड़क और आलीशान मंदिर/कोठियों के भूखे हैं?
  • क्या जबरन वसूली गई ‘सूंढ़’ से देवता प्रसन्न होते हैं?
    *क्या हम भक्ति कर रहे हैं या केवल अपनी ‘चौधराहट’ चमका रहे हैं?

हमें गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। देवी-देवता सादगी के प्रतीक हैं, वे दिखावे से कोसों दूर रहते हैं। यदि हमने इस ‘आस्था के व्यापार’ को नहीं रोका, तो आने वाली पीढ़ियां केवल कंक्रीट के मंदिर और सोने के आभूषण देखेंगी, लेकिन उनमें बसने वाली ‘देव-शक्ति’ और ‘पवित्रता’ को खो देंगी।

हेम सिंह ठाकुर, एक जागरूक देवलु।

नोट : हमारा देव संस्कृति व परंपराओं को गलत ठहराने या उनकी आलोचना करने की कोई मंशा नहीं है। करंट न्यूज़ इस आलेख या खुले पत्र के माध्यम से देव समाज को देव आस्था ने नाम पर मची होड़ से वाकिफ़ मात्र करवाना चाहता है।

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