खेम चंद उर्फ़ मंत्री भाई
खूब था विकास देखा
कुछ तरक्की तो कुछ थी प्रगति देखी
जितनी पीड़ा में है ये पहाड़, प्रकृति, पर्यावरण
इनकी ना थी ऐसी दुर्गति देखी
बोल मेहमान क्या देखा ?
बादलों से बरसती फुहारें देखी
घिरा हुआ आसमान देखा
दरकता,धंसता, टूटता हिमालय देखा
रौद्रता दिखाती हुई
गंगा, जमुना, सतलुज, ब्यास, रावी, चन्द्रभागा का रूप देखा
भयंकर त्रासदी का कैसा स्वरूप देखा
विकास की बातों को किसके अनुरूप देखा
छलनी कर बैठे हैं हम अब इसे
इतना ना इससे पहले हमने ये था कुरूप देखा
बोल मेहमान क्या देखा?
ब्यास की लहरों में बहती इमारतें देखी
पार्वती की तेज़ जलधाराओं की शरारतें देखी
ऐसे ना थी कभी अतीत में ये
प्रकृति की कभी हरकतें देखी
खज़ाने भर दिए हिमालय को नीलाम करके
ऐसी कैसी इर्ष्या वाली बरकतें देखी
बोल मेहमान क्या देखा?
बाहंग- मनाली के हाल देखे
सभी के सभी यहाँ वक़्त के आगे कंगाल देखे
भून्तर- पंडोह की सड़कों को मुड़ते देखा
सैंज बाज़ार को उजड़ते देखा
पंडोह- मंडी शहर को डूबता देखा
तीर्थन की धारा को भी मुखर होते देखा
पलभर में प्रकृति की तबाही देखी
किन कर्मों की ये उगाही देखी
ऊँचे- ऊँचे पुलों को बहते देखता
दर्द बहुत ज्यादा पृथ्वी को भी सहते देखा
माँ है ये ख्याल रखना इसका
यही था बुजुर्गों को कहते देखा
बोल मेहमान क्या देखा?
सड़कों को रुकते देखा
स्वप्नों को हालातों के आगे है झुकते देखा
सिर्फ़ सीना चीरने से मन नहीं भरा था
प्रकृति में मिलाते ज़हर देखा
रोक ना सके बहाव इस बार जो
उन जल बांधों को हाँफते देखा
करो ना छेड़खानी इतनी ज्यादा भी
हदें सारी तुम्हें लांघते देखा
जब उतारू हुई प्रकृति और वक़्त की मार
सबको यहाँ माफ़ी मांगते देखा
सबकुछ यहीं का यहीं रह जाएगा
बस दिखावे का हुक्का सबको फूंकते देखा
बोल मेहमान क्या देखा?
काँगड़ा- चम्बा को ठहरा देखा
किन्नौर- लाहौल में भी पहरा देखा
हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर, मंडी का भी नज़ारा देखा
दर्द हिमाचल का भी सारा देखा
मरहम उतारने लगे थे
घाव फिर कोई गहरा देखा
सिरमौर- शिमला की हरियाली देखी
इंसान की हर जगह मनमानी देखी
कैसे और क्यूँ बसाए थे ये शहर?
आज फिर वो कहानी देखी
जीत पाया है कोई वक़्त से यहाँ प्रकृति के खिलाफ़ जाकर
सराज कहराता बाज़ार आनी देखा
रोती- बिलखती आँखों में सैलाब वो पानी देखा
बोल मेहमान क्या देखा?
डूबते घर- मकान देखे
सभी यहाँ बेबस, हताश और हैरान देखे
बारिश की बूंदों से सबको अब परेशान देखा
कैसे होगा सफर यहाँ से आगे का
समस्याओं के भी निदान देखे
जहाँ- कहीं अधिकार जमाए बैठे थे हम
बस हर जगह तबाही और उगाही के निशान देखे
फिर उठ खड़े होंगें हम
बातों पर अमल करके
इर्ष्या का त्याग करके
अब बातें यही करते इंसान देखे
बोल मेहमान क्या देखा ?
:- कवि गाँव बरनागी, डाकघर तुंग, तहसील बन्जार, ज़िला कुल्लू, हि प्र. से संबन्ध रखते हैं और जीबी पन्त हिमालयी पर्यावरण संस्थान मौहल में कार्यरत हैं।