धर्मचंद यादव,
संपादक, करंट न्यूज़।
हिमाचल प्रदेश में जब से सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी है तभी से सरकार या फिर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर लगातार सिर मुंडाते ही ओले पड़ते आ़ रहे हैं। हालांकि केंद्र सरकार की बिना मदद के भी मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता की मदद करने का हर संभव प्रयास करते आ रहे हैं।
लेकिन उनकी समस्याएं हैं कि खत्म ही नहीं होती जा रही हैं। कभी सियासी संकट, कभी आपदा, कभी समोसा तो कभी बसों में यात्रियों के मोबाइल पर बजते ऑडियो, लगातार उनकी परेशानी बढ़ाते आ रहे हैं।
अगर साफ तौर पर कहा जाए तो सुखविंदर सुक्खू भले आदमी हैं। लंबी राजनीतिक पारी खेलने के बावजूद भी उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरभद्र सिंह ने कभी सत्ता में अधिमान नहीं दिया। बल्कि सुक्खू लगातार उनकी प्रताड़ना का ही शिकार बनते रहे। लेकिन सुक्खू ने कभी हार नहीं मानी और लगातार सियासत की चौसर में बादशाह की तरह बने रहे।
उसी का फल मिला कि विधायक से सीधे मुख्यमंत्री पद पर काबिज हुए। लेकिन संकटों ने यहां भी उनका साथ नहीं छोड़ा। कभी अपने तो कभी पराए उनकी कुर्सी को छिनने का लगातार प्रयास करते आ रहे हैं। सत्ता के खेल में सियासी और प्राकृतिक संकट बने रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से सरकार व मुख्यमंत्री पर ऐसे संकट भी आ रहे हैं, जिनका कोई आधार ही नहीं है। लेकिन उसके बावजूद भी वह लगातार प्रदेश के साथ ही देश भर में चर्चा का मसाला बने हुए हैं।
लेकिन सुक्खू साहब इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हें बेमतलब के झमेलों में धकेलना वाले कौन लोग हैं। पहले समोसा कांड ने मुख्यमंत्री के साथ प्रदेश सरकार को देशभर में हास्य का पत्र बना दिया। जबकि समोसा कांड कोई मसला ही नहीं था। अगर चार-पांच हजार के समोसे कर्मचारियों व अन्यों ने खा भी लिए तो कोई बड़ा घोटाला नहीं था।
लेकिन सरकार के पुलिस अधिकारियों ने समोसे को जिस तरह से उछाला, उसकी वजह से सरकार की देशभर में फजीहत हुई। सीआईडी के अधिकारियों ने जिस तरह से समोसा कांड की जांच को सार्वजनिक किया और अधिकारियों को इस बहाने इधर से उधर किया, वह वास्तव में ही सरकार की छवि पर बट्टा लगाने वाला काम था।
लेकिन सुक्खू साहब इसके बावजूद भी इस मसले की तह तक नहीं पहुंच पाए कि सरकार की छवि को धूल-धूसरित करने वाले कौन लोग हैं। हद तो तब हुई जब पुर्व में मुख्यमंत्री रह चुके जयराम ठाकुर ने अपना राजनीतिक स्तर इतना गिरा दिया कि वह समोसा कांड को लेकर सड़कों पर उतर आए।
छुटभैया नेताओं की तरह गली गली में जाकर समोसा पार्टियां करने लगे और लगातार समोसा कांड को लेकर बयान बाजी करते रहे। यह तो तय था कि समोसा कांड का कोई परिणाम कुछ नहीं निकलना था और वही हुआ भी। कुछ समय बाद समोसा कांड डब्बे में बंद हो गया।
अभी थोड़ी सी राहत हुई थी कि पिछले दिन सरकार के अधिकारियों द्वारा एक नया शगुफा छोड़ दिया गया। किसी व्यक्ति ने बिना साक्ष्य के शिकायत की कि एचआरटीसी की बस में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी को लेकर एक ऑडियो बज रहा था, जो कि उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाला था। हालांकि शिकायतकर्ता ने एचआरटीसी के अधिकारियों को शिकायत के साथ कोई साक्ष्य नहीं भेजा था।
लेकिन इसके बावजूद भी अधिकारियों ने इस मसले पर बस के चालक व परिचालक को नोटिस भेज कर सफाई मांगी तथा उनके खिलाफ जांच बिठा दी गई। यहां भी यह तय था कि समोसा कांड की तरह इस मामले में कुछ सामने आने वाला नहीं है और वही हुआ भी।
एचआरटीसी के अधिकारियों ने तीन-चार दिन सरकार की फजीहत करवाने के बाद साफ किया कि इस मामले में कोई सच्चाई नहीं है। अब सवाल यह है कि अगर कोई व्यक्ति एचआरटीसी की बस में अपने मोबाइल से कोई संगीत या अन्य ऑडियो वीडियो सुन रहा है तो उसे बस के चालक व परिचालक नहीं रोक सकते हैं।
हालांकि इस बात को एचआरटीसी के अधिकारी भी बेहतरी से समझते हैं। लेकिन उसके बावजूद भी सरकार की साख पर बट्टा लगाते हुए एक छोटी सी बात को लेकर इतना बड़ा बवाल खड़ा कर दिया। मीडिया में एचआरटीसी अधिकारियों के बयान आते रहे।
जबकि समोसा कांड की तरह इस ऑडियो मामले की जांच करने की भी कोई आवश्यकता नहीं थी। अगर जांच की ही जानी थी तो निश्चित तौर पर उसे गोपनीय भी रखा जा सकता था। लेकिन न तो समोसा कांड में और न ही बस में चले ऑडियो मामले में अधिकारियों ने सरकार की छवि को बनाए रखना का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। जिसकी वजह से बेमतलब के मसलों को लेकर जनता के बीच में सरकार की साख पर बट्टा लगा।
लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू इस तरह के मसलों को लेकर गंभीर क्यों नहीं दिख रहे हैं। जिनकी वजह से सरकार की छवि लगातार खराब होती जा रही है। वह कौन अधिकारी हैं जो इस तरह के मसलों को बेमतलब तूल देकर सरकार की छवि को तार-तार करने के साथ ही नई परेशानियां खड़ी करते जा रहे हैं।
सुक्खू साहब को ऐसे अधिकारियों की पहचान करनी चाहिए। ताकि भविष्य में इस तरह के टुच्चे मसलों को लेकर सरकार की फजीहत न हो। उसके साथ ही यह भी जांचने की आवश्यकता है कि कहीं, उनकी अपनी सरकार के अपने साथी ही तो नहीं उनकी टांग खींचे में लगे हुए हैं।
फिलहाल, सुक्खू साहब को अपने अधिकारियों को लगाम करने की आवश्यकता है, जो बेलगाम होकर इस तरह के मसलों को हिमाचल की फिजाओं में उड़ाते आ रहे हैं। जिनकी वजह से प्रदेश की जनता में सरकार के प्रति अविश्वास की भावना पैदा की जा रही है और सरकार के प्रति नाकारात्मक माहौल पैदा किया जा रहा है।