राजीव गोस्वामी
हिमाचल प्रदेश आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ सरकार की अपनी तिजोरी खाली है, लेकिन जनता के हिस्से की राहत पर कैंची चलाने की पूरी तैयारी है।
बीते दिन वित्त सचिव द्वारा दी गई सब्सिडी पूरी तरह बंद करने की सलाह सिर्फ एक वित्तीय सुझाव नहीं, बल्कि उस ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की पोल है, जिसका वादा चुनाव से पहले किया गया था।
चुनाव जीतने के लिए 300 यूनिट मुफ्त बिजली और 1500 रुपये की ‘गारंटी’ दी गई थी। आज आलम यह है कि जो बिजली पहले से मिल रही थी, उस पर भी संकट है।
सरकार ने “आयकर दाताओं” से शुरुआत की और अब सुझाव है कि हर तरह की सब्सिडी खत्म कर दी जाए। यानी, सत्ता पाने के लिए जो सीढ़ी इस्तेमाल की गई, उसे अब आग लगाई जा रही है।
फिजूलखर्ची पर ‘मौन’ व्रत
एक तरफ वित्त सचिव कहते हैं कि सरकारी खजाना खाली है, इसलिए न नई भर्ती होगी, न सब्सिडी मिलेगी। लेकिन क्या सरकार ने अपने ‘सुख-साधनों’ में कोई कटौती की?
मंत्रियों और आला अधिकारियों की नई लग्जरी गाड़ियाँ और उनके काफिले क्या कम खर्चीले हैं? जब खजाना खाली है, तो सलाहकारों की फौज पर जनता का पैसा क्यों लुटाया जा रहा है?
सिस्टम का दोष या ‘नियत’ का?
सरकार अब केंद्र से मिलने वाले ‘राजस्व घाटा अनुदान’ के बंद होने का रोना रो रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब आप जानते थे कि राज्य कर्ज के बोझ तले दबा है, तो करोड़ों की नई योजनाएं और नियुक्तियां क्यों की गईं? क्या हिमाचल के युवाओं को सिर्फ खाली पदों के समाप्त होने की खबर ही सुनने को मिलेगी?
घी तो पिएंगे, चाहे कर्ज लेकर पिएं
हिमाचल सरकार की नीति अब उस पुरानी कहावत जैसी हो गई है-
“ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्” (कर्ज लो और घी पियो)। फर्क बस इतना है कि घी तो सत्ता के गलियारों में पिया जा रहा है, और कर्ज चुकाने के लिए जनता की थाली से सब्सिडी का निवाला छीना जा रहा है।
अगर वित्त सचिव का सुझाव मानकर सब्सिडी बंद की जाती है, तो एचआरटीसी का किराया बढ़ेगा, बिजली महंगी होगी और स्वास्थ्य सेवाएं (हिमकेयर) दम तोड़ देंगी। सरकार को समझना चाहिए कि खर्चों में कटौती की शुरुआत ऊपर से होनी चाहिए, न कि सबसे नीचे खड़े गरीब आदमी की जेब से।
हिमाचल की जनता को व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर बदहाली का परिवर्तन मिल रहा है। सरकार अगर सब्सिडी बंद करती है, तो यह प्रदेश के आम नागरिक के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।
–लेखक हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी फेसबुक वॉल से साभार।