शिमला : हिमाचल प्रदेश में PWD मंत्री विक्रमादित्य सिंह और अफसरशाही के बीच विवाद गहराता ही जा रहा है..इस विवाद पर अब एक सेवानिवृत्त IPS अधिकारी खुलकर सामने आए हैं।
पूर्व DIG विनोद धवन ने हिमाचल की IAS और IPS एसोसिएशन के बयान की निंदा करते हुए अनुचित, असंवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ करार दिया।
विनोद धवन ने कहा कि किसी मंत्री द्वारा दिए गए बयान से असहमति हो सकती है, लेकिन संविधान सभी को अभिव्यक्ति की आजादी देता है। ऐसे में इस तरह की सामूहिक प्रतिक्रिया सही नहीं है।
उन्होंने IPS एसोसिएशन द्वारा जारी बयानों को सेवा की गरिमा और संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ करार दिया। IPS एसोसिएशन ने मंत्री विक्रमादित्य के साथ ड्यूटी देने से इनकार कर दिया था। इसी तरह IAS एसोसिएशन ने भी मंत्री के शासक नहीं बनने के बयान की निंदा की थी।
विनोद धवन ने बताया- IPS जैसी संवैधानिक संस्था ने एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित मंत्री के बयान पर सामूहिक रूप से ऐसी भाषा का प्रयोग किया, जो अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को दी जाने वाली कानून व्यवस्था और सुरक्षा सेवाओं को रोकने जैसी चेतावनी की ओर इशारा करती है।
उन्होंने कहा- यह प्रतिक्रिया न केवल संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है, बल्कि अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) जैसे मौलिक अधिकारों की भावना के भी खिलाफ है।
रिटायर्ड IPS अधिकारी ने सवाल उठाया कि ‘क्या IPS अधिकारी या उनकी एसोसिएशन को यह अधिकार है कि वे किसी नागरिक या राजनीतिक व्यक्ति के प्रति कानून के संरक्षण को लेकर सार्वजनिक रूप से चेतावनी या धमकी जैसा संदेश दें?
धवन ने कहा- पुलिस सेवा का मूल उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें डराने या सेवाओं के बहिष्कार का संकेत देना। उन्होंने IPS को ‘संविधान की आत्मा और नागरिकों के अधिकारों का रक्षक’ बताते हुए कहा कि हालिया बयानबाजी ब्रिटिश काल की पुलिस मानसिकता की याद दिलाती है।
उन्होंने यह भी कहा- यदि किसी मंत्री का बयान गलत है, तो उसका जवाब संवैधानिक, कानूनी और मर्यादित तरीके से दिया जाना चाहिए, न कि ऐसी भाषा में, जिससे यह लगे कि पुलिस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से पीछे हट सकती है।
विनोद धवन ने इसे एक खतरनाक मिसाल बताया और कहा कि अगर सुरक्षा देने वाली संस्थाएं ही यह संकेत देने लगें कि वे नागरिकों को कानून का संरक्षण देने से पीछे हट सकती हैं, तो यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।
(फेसबुक पेज से साभार)