डॉ. संजीव शर्मा
बीजेपी का अध्यक्ष तय हो चुका है, सिर्फ घोषणा बाकी है। वह भी शायद इसलिए क्योंकि दिल्ली के नतीजे उसमें एक अहम् परिवर्तन करने में सक्षम हैं। अगर दिल्ली में बीजेपी जीती तो शायद चिट दुबारा लिखी जाए अन्यथा जितेंद्र सिंह को जो चिट दी गयी है वह उसे आकर पढ़ देंगे।
लेकिन इससे इतर अब कांग्रेस में भी अध्यक्ष पद की रेस दिलचस्प होती जा रही है। यहाँ दिल्ली चुनाव का परिणाम प्रभावी नहीं होगा यह भी सब जानते हैं इसलिए उससे पहले ही चौसर बिछाई जा रही है।
उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री जहाँ दिल्ली से कोसों दूर प्रयागराज, काशी में धर्म कर्म में जुटे हैं वहीं उनका विरोधी धड़ा उनको निपटाकर बड़ा काण्ड करने की कोशिश में लगा है।
नई थ्योरी यह है के मुकेश को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए। इसके लिए गज़ब का जो तर्क दिया गया है वह यह कि ब्राह्मण लगातार कांग्रेस से विमुख हो रहे हैं। उनको थामने के लिए ब्राह्मण को पार्टी अध्यक्ष बनाना जरुरी है।
तर्क के साथ हाई कमान को यह समझाया जा रहा है के सुखराम व जीएस बाली के जाने के बाद कोई बड़ा ब्राह्मण नेता अब कांग्रेस में है तो मुकेश ही हैं जो कांग्रेस के प्रति ब्राह्मणों की इस विमुखता को रोक सकते हैं। तर्क के साथ जो अनुपूरक लिस्ट है।
उसमें बताया गया है के सुधीर शर्मा चले गए, इंद्र दत्त लखनपाल चले गए, चैतन्य शर्मा चले गए,(डॉ राजेश भी गए ही समझो) (हालाँकि यह नहीं बताया जा रहा कि क्यों गए) ऐसे में मुकेश ही संभाल सकते हैं।
इसके लिए बाकयदा व्यूहरचना भी की गयी है। जिनको मुख्य विरोधी माना जाता रहा उन्हें अब साथ रखकर मुकेश की खाली होने वाली कुर्सी का प्रलोभन दिया जा रहा है। इस उम्मीद में कि यह प्रलोभन इसलिए काम करेगा क्योंकि सम्बंधित नेता या गुट को शुरू से ही यही वाली कुर्सी चाहिए थी।
यानी समझ =रहे हो न —-सियासत में कोई भी हमेशा के लिए शत्रु या मित्र नहीं होता—जिसे जब इस्तेमाल किया जा सके करना चाहिए और ऐसा करने की कला में माहिर कलाकार की हमेशा पौ बारह होती है। अब मोहरे पर है कि वह राजा को बचाने के लिए कितना और कहाँ तक कुर्बान होता है।
बहरहाल इतनी आसानी से तो शायद ही मुकेश भी क़ुरबानी दें…उनके धड़े ने भी लास्ट वाला तर्क —कि मुकेश ही संभाल सकते हैं— थोड़ा स्तरोन्नत करके इस्तेमाल करने की पेशकश रख दी है। साथ ही ऐसी स्थितियों में संबलता बढ़ाने के लिए आरक्षित वर्ग से अध्यक्ष बनाये जाने की बात भी बढ़ा दी है।
मुकेश के खेमे का कहना है कि मुकेश के रूप में ब्राह्मण वर्ग को तो प्रतिनिधित्व है ही, आरक्षित वर्ग का अध्यक्ष बनाने से वोट बैंक और मजबूत होगा। इस तर्क से कांग्रेस अध्यक्ष प्रथम दृष्टया सहमत दिखे हैं और ऐसे में पहले वाला खेमा थोड़ा असहज हो सकता है।
क्योंकि उसके पास फ़िलहाल आरक्षित वर्ग का कोई वरिष्ठ नेता नहीं है (जो हैं वह मंत्री पद खोना नहीं चाहते)। इसलिए यहाँ अपनी फैंकी रस्सी अपने ही गले में फंस सकती है।
वैसे भी एक प्लानिंग तो यह भी होगी के ब्राह्मण के नाम पर मुकेश का नाम आगे करो, अब चूँकि मुकेश इतनी आसानी से निबटेंगे नहीं। इसलिए बाद में अपनी पसंद के ब्राह्मण नेता को अध्यक्ष बनवा लो। जिसकी शुरुआत छह माह पहले की भी जा चुकी है (कार्यकारी का तमगा लगवाकर)।
लेकिन फिर अगर मुकेश खेमे ने दूसरी तरफ से कोई उनसे भी बड़ा रत्न पेश कर दिया तो मसला दिलचस्प हो जायेगा। क्योंकि वह ब्राह्मण के साथ साथ बड़े जिले का भी रत्न होगा।
डॉ. संजीव शर्मा हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी फेसबुक वॉल से साभार।