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धर्मचंद यादव,
स्ंपादक, करंट न्यूज।

हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के राज्य से लेकर ब्लॉक तक के संगठनों में दशकों से ऐसे नेताओं का कब्जा रहा है जो सियासत में पूरी तरह से थके व हारे होने के साथ-साथ जनता द्वारा भी नकारे गए हैं। लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता ऐसे नेताओं को संगठन से बाहर का रास्ता दिखाने की हिम्मत अभी तक नहीं कर पाए।

यही वजह है कि आज हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस संगठन केवल नाम मात्रा के लिए ही बचा हुआ है। हालांकि कांग्रेस में नेता तो बहुत है लेकिन उनके न जनता में पकड़ है और न ही वह संगठनात्मक तौर पर सभी कार्यकर्ताओं व नेताओं को साथ लेकर चलने की कुव्वत रखते हैं।

जिसका खामियाजा कांग्रेस पार्टी को हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी लोकसभा की 4 में से एक भी सीट पर अपना वर्चस्व कायम नहीं कर पाई। हद तो तब हो गई जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ही पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए नहीं पहुंच पाई। ब्लॉक स्तर पर भी कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में कांग्रेस के नेता पूरी तरह से नाकाम रहे। जिला स्तर पर भी लगातार खेमेबंदी के चलते नेता मतदाताओं तक अपनी पहुंच नहीं बना पाए।

अगर साफ तौर पर कहें तो प्रदेश में कांग्रेस का संगठन पूरी तरह से कुंभकरणी निद्रा में पड़ा हुआ है। नेता अपने-अपने अहम के चलते कार्यकर्ताओं को एक जुटता में बांधने में पूरी तरह असफल रहे। यही वजह रही है कि प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों ने दमदार जीत हासिल की।

जबकि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार सत्ता में होने के बावजूद भी कांग्रेस मतदाताओं को लुभाने में पूरी तरह से नाकाम रही। हिमाचल में कांग्रेस की नाकामी का सबसे बड़ा करण करण प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की अपनी सरकार के खिलाफ लगातार बयान बाजी भी रही है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने सरकार बनते ही अपने तेवर सरकार व मुख्यमंत्री के खिलाफ तीखे कर लिए थे। वह लगातार किसी न किसी बहाने सरकार व मुख्यमंत्री को निशाने पर लेती रही। जिसकी वजह से सरकार व संगठन में आपसी तालमेल नहीं बन पाया।

उसी का परिणाम यह भी रहा कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस का बहुमत होने के बावजूद भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। उसके साथ ही अपने छः विधायकों को भी खोना पड़ा। लेकिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने इसका ठीकरा भी मुख्यमंत्री पर ही फोड़ा।

उन्होंने संगठन को मजबूत करने की दिशा में रत्ती भर भी प्रयास नहीं किया। हर जिला में थके हारे व जनता द्वारा नकारे नेता समानांतर संगठन चलाते आ रहे हैं।

लेकिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ऐसे नेताओं पर भी लगाम नहीं लगा पाई, बल्कि उनको लगातार शह देती रही। जिसकी वजह से पूरे प्रदेश में कांग्रेस संगठन का कबाड़ा हो गया। कई जिलों में संगठन की कमान ऐसे नेताओं को सौंपी गई, जो लगातार भाजपा नेताओं के साथ गलबहियाँ डालते आ रहे हैं। उनके खिलाफ पार्टी में विद्रोह होने के बावजूद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। फिलहाल हिमाचल प्रदेश कांग्रेस संगठन को राज्य से लेकर ब्लॉक स्तर तक कांग्रेस हाई कमान ने भंग कर दिया है।

नई कार्यकारिणी के गठन के लिए कांग्रेस हाई कमान द्वारा हिमाचल प्रदेश में कई नेताओं को पर्यवेक्षक के तौर पर भेजा गया है। जो सर्वे करके संगठनात्मक तौर पर मजबूत नेताओं की रिपोर्ट कांग्रेस हाई कमान को देंगे।

पार्टी सूत्रों की माने तो संभवत अगले बरस जनवरी माह के प्रथम पखवाड़े में प्रदेश कार्यकारिणी का गठन कर लिया जाएगा।लेकिन सवाल यह है कि क्या हिमाचल कांग्रेस संगठन में पूर्व में रहे थके हारे व जनता द्वारा नकारे गए नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा?

हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह बार-बार दावा करती आ रही है कि आप संगठन में मजबूत हुआ युवा नेताओं को अधिमान दिया जाएगा, ताकि संगठन को मजबूती मिल सके।

लेकिन आशंका यह भी जताई जा रही है कि जिस तरह से प्रतिभा सिंह लगातार अपनी सरकार व मुख्यमंत्री के खिलाफ बयान बाजी करती आ रही है, उससे यह उम्मीद कम ही जताई जा सकती है कि आने वाले समय में संगठन के भीतर कर्मठ व जनता में पकड़ रखने वाले नेताओं को स्थान मिलेगा। अगर स्थित पूर्व की भांति ही रही तो निश्चित तौर पर सरकार व संगठन में किसी भी तरह का तालमेल नहीं बन पाएगा और आने वाले समय में कांग्रेस की दशा और खराब होने वाली है।

फिलहाल देखना यह है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू प्रदेश में कांग्रेस संगठन को खड़ा करने में क्या भूमिका निभाते हैं और कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के नेता प्रदेश कार्यकारिणी के गठन में किन नेताओं को तरजीह देते हैं

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