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NPCI की तिजोरी फुल फिर भी दुकानदार से वसूली का फरमान, पहले फ्री की चाशनी से चिपकाया, अब चार्ज का फ़रमान

केशव ठाकुर।

याद कीजिए वो दौर। नोटबंदी के बाद हर गली-नुक्कड़, हर चाय की टपरी, पान के ठेले और किराना दुकान पर एक लड़का आकर QR कोड चिपका जाता था। नारा एक ही था – डिजिटल इंडिया। कैशलेस बनो, मॉडर्न बनो, देश बदलेगा।

और ऑफर? एकदम फ्री। जीरो MDR। न दुकानदार पर चार्ज, न ग्राहक पर बोझ। सरकार ने खुद पीठ थपथपाई कि देखो, दुनिया में सबसे सस्ता और तेज पेमेंट सिस्टम हमने बना दिया।

छोटे दुकानदार ने भी सोचा – चलो, छुट्टे की टेंशन खत्म, ग्राहक खुश। उसने QR को भगवान बना लिया।

*अब पर्दा उठा है दूसरे अध्याय से*

अब वही सरकार, वही सिस्टम कह रहा है – अब फ्री नहीं चलेगा।

खबर पक्की है, तैयारी है – बड़े दुकानदारों पर MDR लगाने की। आंकड़ा सुनिए – *₹5,000 के ट्रांजैक्शन पर ₹20 सीधा कट, ₹10,000 पर ₹40 का चार्ज।* छोटा नहीं, बड़ा डाका है। अगर दिन में 50 हजार का धंधा है तो महीने का 600 रुपया नहीं, हजारों रुपये UPI कंपनी की झोली में।

*और सबसे घटिया तर्क क्या दिया जा रहा है?*

कह रहे हैं – UPI चलाने का खर्च आता है। मेंटेनेंस लगता है।

जरा NPCI की बैलेंस शीट देख लीजिए। UPI चलाने वाली नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन पिछले तीन साल से हजारों करोड़ के ऑपरेटिंग सरप्लस में है। न घाटा है, न कंगाली है। फिनटेक एक्सपर्ट खुलकर कह रहे हैं – ये मुनाफे का सिस्टम है, घाटे का नहीं। फिर ये वसूली क्यों?

*असली खेल तो दिलासे में है*

कहा जा रहा है – अरे, ग्राहक को नहीं देना, दुकानदार देगा।

वाह! क्या मासूमियत है।

कौन सा दुकानदार अपनी जेब से सरकार का टैक्स भरता है? क्या पेट्रोल पंप वाला एक्साइज ड्यूटी अपनी सैलरी से देता है? नहीं, वो दाम में जोड़कर हमसे ही वसूलता है।

यही होगा। सब्जी वाला, मेडिकल वाला, कपड़े वाला – हर कोई ₹20 का घाटा पूरा करने के लिए सामान ₹5 महंगा कर देगा। कटेगा दुकानदार के खाते से, निकलेगा आपकी जेब से।

*कड़वा सच ये है*

पहले आपको कैश की लत से निकाला गया, फ्री का लालच देकर डिजिटल का आदी बनाया गया। जब पूरा देश अंगूठा मारना सीख गया, UPI के बिना चाय भी नहीं मिलती, तब उसी अंगूठे पर टैक्स ठोकने की तैयारी है।

ये डिजिटल इंडिया नहीं, डिजिटल टोल नाका है।

*फॉर्मूला स्पष्ट है – पहले सुविधा को फ्री में आदत बनाओ, फिर उसी आदत पर टैक्स लगाओ और उसे सुधार का नाम दे दो।*

;- लेखक हिमाचल प्रदेश के मंडी व कुल्लू जिला की सीमा पर स्थित रोपा से संबंध रखते हैं। वह पेशे से स्कूल प्रिंसिपल रहे हैं। उच्च कोटि के शिक्षाविद होने के साथ ही वह रोपा में ओशो फ्रेंड्स होम का संचालन करते हैं।

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