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सैंज (कुल्लू), करंट न्यूज़: सैंज घाटी की बनोगी कोठी के पटाहरा गांव में भादों अमावस्या पर आयोजित पारंपरिक *हूम उत्सव* श्रद्धा और रोमांच के अद्भुत संगम के साथ संपन्न हुआ।

माता दुर्गा बनोगी देहूरी के इस पावन आयोजन में घाटी सहित कुल्लू-मंडी के हजारों श्रद्धालुओं ने माता रानी के दर्शन कर सुख-समृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा की कामना की।

*क्या है देहूरी और हूम का ऐतिहासिक रहस्य?*

कुल्लू की देव परंपरा में *‘देहूरी’* का विशेष स्थान है। मान्यता है कि यह देवी का मूल स्थान से बाहर अस्थायी पवित्र धाम होता है, जहां दुष्ट आत्माओं को भगाने के लिए *‘हूम’* का आयोजन होता है।

इतिहासकारों के अनुसार हूम की परंपरा आषाढ़-सावन में बुरी शक्तियों के नाश के लिए शुरू हुई थी। इसके लिए देव-वाणी से देवदार के पेड़ को काटकर उसकी पतली-पतली छड़ियों को सुखाया जाता है और फिर बांधकर *40 फुट लंबी विशाल मशाल ‘दी’* बनाई जाती है।

मान्यता है कि जब यह ‘दी’ देहूरी मंदिर में जलती है, तो पूरे क्षेत्र की नकारात्मक शक्तियां नष्ट हो जाती हैं।

बनोगी देहूरी माता का इतिहास और भी प्राचीन है। जानकारी के अनुसार माता *12 साल बाद ऐतिहासिक परिक्रमा* पर निकलती हैं और पूरी बनोगी कोठी का भ्रमण कर लोगों को आशीर्वाद देती हैं।

*ऐसे मना उत्सव – मशालों के सैलाब में निकली माता की सवारी*

मंदिर में वैदिक पूजा के बाद देव खेल के साथ देव कार्य आरंभ हुआ। माता दुर्गा के साथ मशानी वीर, पंचवीर, देवता जेहर, वोदली माता तथा ब्रह्मा देवता के गूरों ने देव परंपरा निभाई। गूर के माध्यम से कई श्रद्धालुओं को आसुरी बाधा से मुक्ति भी दिलाई गई।

रात होते ही नजारा अलौकिक हो गया। माता की देवरथ यात्रा सैकड़ों जलती मशालों के साथ *नाहीं गांव की जोगणी* के थान से होती हुई देहूरी मंदिर पहुंची।

वहां से मुख्य कारकून मन्याशी गांव पहुंचे, जहां हारियानों ने विशाल ‘दी’ को कंधों पर उठाकर पंडीर ऋषि मंदिर की परिक्रमा करवाई और स्थापित किया। पूरी रात देव नाटी और मंत्रोच्चार से घाटी गूंजती रही।

शुक्रवार प्रातः माता दुर्गा और पंडीर ऋषि के समक्ष हवन-पूजन के साथ हूम उत्सव का समापन हुआ। इस महा आयोजन ने एक बार फिर सैंज घाटी की देव संस्कृति और सामाजिक एकता को जीवंत कर दिया।

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