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हमने कुछ समय पहले अपना बहुचर्चित कालम “नारद खबर लाए” शुरू किया है। जिसमें उन घटनाक्रम को रोचक तरीके से पाठकों के समक्ष पेश किया जाता है, जिनमें शामिल घटनाक्रम के पत्रों को सीधे तौर पर उल्लिखित नहीं किया जा सकता है, या उनकी पहचान संकेतात्मक तरीके से बताई जाती है। इसके साथ ही हम इस कालम के माध्यम से किसी की निजता व व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर किसी तरह की भी अमर्यादित टिप्पणी नहीं करते हैं।

करंट न्यूज डेस्क, कुल्लू : पिछले काफी दिनों से तीनों लोकों की खबर रखने वाले सृष्टि के पहले पत्रकार नारद महाराज यमलोक में काफी व्यस्त रहे। जहां पर वह पृथ्वी लोक से जाने वाले कई महारथियों की कुंडलियां खंगाल रहे थे।

लेकिन इसी बीच हमने उनको धूपबत्ती करके याद किया। तो उनको ध्यान आया कि काफी दिनों से पृथ्वी लोक का भ्रमण नहीं किया है। तो उन्होंने पृथ्वी लोक का रुख कर लिया। वह विचरण करते हुए सीधे अयोध्या के न्यारे भगवान रघुनाथ की नगरी में पहुंचे।

“ओ दूर के मुसाफिर मुझे भी साथ ले चल हम दफ़्तर में रह गए अकेले”

नारद ज्यों ही भगवान रघुनाथ की नगरी में पदार्पण करने लगे, तो देखते हैं कि एक बड़े भवन के बाहर बहुत से लोग एकत्रित हैं। ज्यों ही नारद आगे बढ़े तो पता चला कि किसी बड़े महानुभव को विदाई दी जा रही है। अब वह विदाई समारोह का मंजर देखने के लिए रुक गए।

भीतर जाकर देखते हैं कि जिनको उनके संगी साथियों ने छोटे डीसी साहब के खिताब से नवाजा हुआ है, वह काफी परेशान व दुखी हैं। खुसर फुसर सुनने पर पता चला कि छोटे डीसी साहब का सरमायेदार अब कोई नहीं रहा।

उनकी पीड़ा भर भर कर बाहर निकल रही थी। न तो वह आंसू बहा पा रहे थे और न ही अपनी पीड़ा को शब्दों के माध्यम से बयां कर पा रहे थे।

हालांकि इसे पूर्व उन्होंने नंबर दो डीसी का खिताब हासिल महानुभाव की विदाई के अवसर पर जमकर आंसू बहाए थे। लेकिन इस समारोह में उन्हें यह सुअवसर भी नहीं मिल पाया।

समारोह के बाद वह डबडबाई आंखों से उस दरवाजे को बड़े मनुहार से ताकते रहे, जिसके भीतर बड़े महानुभाव के साथ उनकी महफ़िल जमती थी, अब उस दरवाजे पीछे उनकी बड़ी मधुर यादें दफन हो गई। पता चला कि घर जाते समय वह गुनगुना रहे थे “ओ दूर के मुसाफिर मुझे भी साथ ले ले हम दफ़्तर में रह गए अकेले”।

“राय साहब” के सम्मान में “मर्यादाओं की बलि”

नारद घूमते-घामते एक बड़े कार्यालय के बाहर पहुंचे, तो देखा वहां भी कुछ लोगों का जमघट लगा हुआ है। वह लोग पृथ्वी लोक के सर्वज्ञता-सर्वहारा माने जाते हैं। ऐसे में नारद को लगा कि पृथ्वी लोक में कोई मानवीय सरोकार से राफ़ता रखने वाला कार्यक्रम होने वाला होगा।

लेकिन नारद महाराज क्या देखते हैं कि तभी इलाके के नए “राय साहब” अपने उड़न खटोले से उतरते हैं और जितने भी सर्वज्ञानी महाराज वहां पर मौजूद थे, सब राय साहब की ओर द्रुत गति से लपकते हैं। नारद देखते हैं कि कोई गले में लिपट रहा है तो कोई गलबहियां में पड़ रहा है। साथ ही “राय साहब” के सम्मान में कसीदे पढ़े जाने लगे।

बारी-बारी से सबके आभामंडल पर बिजलियां चमकने लगी। भगवान को चढ़ाए जाने वाले पुष्प की वर्षा होने लगी। नारद महाराज यह सब देखकर हैरत में पड़ गए कि इस तरह का मंजर तो उन्होंने आज तक पृथ्वी लोक में देखा ही नहीं था। बल्कि वह खुद भी देवलोक में किसी के स्वागत के लिए भी इस तरह से लोटपोट नहीं हुए थे।

नारद महाराज काफी देर तक मर्यादाओं को बलि चढ़ते हुए देखते रहे और राय साहब सबको अपने पहलू में पड़े देखकर मंद मंद मुस्कुराते रहे। वहीं, महाज्ञानियों के आभामंडल पर एक अलग ही अपने को गौरवान्वित करने (भ्रम में रखने वाली) मुस्कान लिए हुए ऐसे निकले मानों किसी जांच कमेटी से क्लीनचिट मिल गई हो।

बीरबल के लिए जख्म से नासूर बन गया मंत्रिपरिषद में ताजपोशी की जंग

राजनीति भी अब पहले जैसी नहीं रही है। देवलोक में भी राजनीति के अलग-अलग समीकरण रहे हैं। नारद महाराज देवलोक से लेकर पृथ्वी लोक तक की राजनीति का अवलोकन करते आए हैं। लेकिन पृथ्वी लोक की राजनीति को वह कभी समझ नहीं पाए।

पिछले दिनों नारद महाराज एक राजनीतिक सभा में पहुंचे। तो क्या देखते हैं कि सभा के सभापति अकबर महाराज गरज कर बोले, हम अकबर को जल्द ही अपने महामंत्रियों में शामिल करेंगे, उनका मान सम्मान आसमान छूएगा। वही, अकबर भी गदगद हो उठे। कि अब तो मंत्रिपरिषद में शामिल हो ही जायेंगे। मगर तख्त अभी बड़ी दूर दिख रहा है।

लेकिन उसके बाद जब उनके संगी साथियों ने ठिठोली करते हुए कहा बीरबल तुम्हारा नाम तो महामंत्रियों की सूची में कई बार शामिल करने की घोषणा अकबर महाराज ने की है। लेकिन महाराज ने अपनी घोषणा को पूरा नहीं किया और शायद अभी भी नहीं होगी। यह सुनकर बीरबल के जख्म फिर हरे होंगे। क्योंकि मंत्रिपरिषद में शामिल करने की चर्चा सभापति महाराज अकबर लंबे समय से करते आ रहे हैं जो अब बीरबल के लिए जख्म से नासूर बन गया है।

हालांकि महाराज ने बीरबल को अपने खास रसोई मंत्री परिषद में भी शामिल किया था। लेकिन भाग्य की मार ऐसी पड़ी की रसोई मंत्री परिषद से भी बाहर हो गए। मंत्री परिषद में शामिल होने की पीड़ा गहरे जख्म में बदलते हुए दर्द देती रही, मगर, मंत्री परिषद में ताजपोशी नहीं हो पाई। अब अकबर महाराज ने फिर बीरबल को झांसा दिया कि जल्द ही बीरबल को अपने मंत्री परिषद में शामिल करेंगे।

लेकिन अकबर के पास भी अब काफी कम समय बचा हुआ है। ऐसे में अगर बीरबल मंत्री परिषद में शामिल भी हो जाते हैं तो उन पर वह कहावत चरितार्थ होगी कि “सिर मुंडाते ही ओले पड़ गए”। यही वजह है कि बीरबल का मंत्री परिषद में शामिल होने वाला जख्म अब नासूर बन गया है, जो उन्हें अरसे तक गहरी पीड़ा देता रहेगा।

नारद महाराज ने देखा कि घोषणा करते वक्त अकबर महाराज ‘घुनी’ हंसी हंस रहे थे। जिससे जाहिर होता है कि वह बीरबल को दिल से मंत्री परिषद में शामिल करने के इच्छुक नहीं हैं।

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