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मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा।

कुछ समय से हिमाचल प्रदेश के तथाकथित “हितों” को लेकर अचानक हितोपदेश की बाढ़-सी आ गई है। यह वह मौसम है जब सियासत के अखाड़े में नैतिकता की खम ठोंकी जाती है—कभी चुनाव की आहट से, कभी अपनी ही पार्टी के नेतृत्व पर दबाव बनाने के लिए, कभी पाला बदलने की पूर्वसूचना के तौर पर और कभी पाला बदल लेने के पश्चात आत्मरक्षा के कवच की तरह।

हिमाचल की राजनीतिक धूल में इन चारों में से कौन-सी आंधी चल रही है, इसका फैसला वक्त करेगा, लेकिन फिलहाल विक्रमादित्य सिंह का हालिया बयान इस धूल को गुबार में बदल चुका है।

बयान भले ही बाहर से “बाहरी आईएएस अधिकारियों की हेकड़ी और प्रशासनिक शिथिलता” पर केंद्रित दिखता हो, लेकिन भीतर से वह नेताओं की संरचनात्मक कमजोरी को नंगा करता है।

यह बयान उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री के मंडी रैली में दिए गए वक्तव्य की प्रतिध्वनि भर नहीं है, बल्कि सत्ता के गलियारों में जमा असहज सन्नाटे को सार्वजनिक मंच पर उछाल देने जैसा है। यही कारण है कि यह बयान साधारण प्रशासनिक आलोचना न रहकर राजनीतिक हलचल का कारण बन गया।

हलचल इसलिए भी है क्योंकि यह कोई पहली बार नहीं है। विक्रमादित्य सिंह और उपमुख्यमंत्री पहले भी कई दफा कह चुके हैं कि आईएएस अधिकारी ठीक से काम नहीं कर रहे। सवाल यह नहीं है कि अधिकारी काम कर रहे हैं या नहीं, सवाल यह है कि सत्ता में बैठे जिम्मेदार नेता अब भी छायावाद में क्यों बोल रहे हैं? क्यों वे नाम लेकर सामने नहीं आते? क्यों प्रदेश की जनता को आधे-अधूरे इशारों में संतुष्ट करने की कोशिश की जा रही है?

यह यक्ष प्रश्न है—क्या मंत्री और उपमुख्यमंत्री इतने कमजोर हैं कि वे अपने ही अधीनस्थ अधिकारियों का नाम लेने का साहस नहीं कर सकते? या फिर उन अधिकारियों के पास ऐसी कमजोरियां , ऐसे राज, ऐसी फाइलें हैं जिनके कारण राजनीतिक जुबान पर ताले लगे हैं? या फिर यह सब सत्ता-संतुलन की उस मजबूरी का संकेत है जिसमें सरकार खुद अपने प्रशासनिक ढांचे की बंधक बन चुकी है?

इस बयान के बाद विपक्ष को बैठे-बिठाए हथियार मिल गया है। वह पूरी सरकार को कमजोर, दिशाहीन और नियंत्रणविहीन करार दे रहा है। उससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही अप्रत्यक्ष तीर छोड़े जा रहे हैं—कभी नेतृत्व पर, कभी कार्यशैली पर, कभी नीयत पर।

प्रदेश की जनता भी अब केवल आरोप नहीं, नाम चाहती है। कौन-कौन से अधिकारी हैं जो हिमाचल के हितों को बेच रहे हैं? किन-किन विभागों में लूट का खेल चल रहा है—खनन, हाइड्रो पावर, लोक निर्माण, जल जीवन मिशन, स्वास्थ्य या कोई और? जब दो जिम्मेदार संवैधानिक पदों पर बैठे नेता इस मुद्दे को सार्वजनिक डोमेन में धकेल चुके हैं, तो अब अधूरा सच बोलना राजनीतिक अपराध से कम नहीं।

इसी बीच राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि कहीं फरवरी 2023 जैसी पटकथा की रिहर्सल तो नहीं हो रही। अप्रैल में राज्यसभा चुनाव हैं। वही विक्रमादित्य सिंह, जिन्होंने 2023 में मतदान से ठीक पहले इस्तीफा देकर राजनीतिक भूचाल पैदा किया था—हालांकि बाद में इस्तीफा वापस ले लिया—लेकिन उसी घटनाक्रम में कांग्रेस के छह विधायकों ने भाजपा को वोट देकर पार्टी उम्मीदवार को पराजित कर दिया था।

हालांकि इस बार वैसा होना “ज्यादा दम नहीं रखता।” सरकार का कार्यकाल अभी इतना नहीं है कि 12–13 विधायक पार्टी छोड़ने या क्रॉस वोटिंग का जोखिम उठाकर हाईकमान की नाराज़गी मोल लें। लेकिन राजनीति में संकेत भी कभी-कभी घोषणा से ज्यादा खतरनाक होते हैं।

और शायद यही सबसे बड़ी विडंबना है—जब सत्ता के भीतर बैठे लोग खुद अपने शब्दों से अपनी सरकार की साख काटने लगें, तो विपक्ष को कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

–लेखक हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं ग्राम परिवेश पत्रिका के संपादक हैं।

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