तरुण श्रीधर
“अगर गांव को संविधान में उचित स्थान नहीं मिलेगा, तो संविधान का क्या लाभ?”, ऐसा कहा था महात्मा गांधी ने। आज संविधान के पन्नों में सम्माननीय स्थान तो है लेकिन तर्क-वितर्क ने विभिन्न लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में एक वैमनस्य पैदा कर दिया है।
हिमाचल प्रदेश राज्य चुनाव आयुक्त ने स्थानीय निकायों, अर्थात् पंचायत और म्युनिसिपल संस्थाओं के चुनाव की प्रक्रिया को औपचारिक और आधिकारिक रूप से प्रारंभ कर दिया। लेकिन प्रदेश सरकार का यह मत है कि चुनाव को अभी स्थगित किया जाए। कारण समझाया गया है आपदा के कारण हुए अस्त व्यस्त जीवन और अधिसंरचना को पुनर्स्थापित करना।
राज्य चुनाव आयुक्त यह मानते हैं कि चुनाव विधि अनुसार समय पर ही होने चाहिए। मीडिया, सोशल भी, इस स्थिति को दोनों वैधानिक संस्थाओं, एक ओर प्रजातांत्रिक सरकार और दूसरी ओर राज्य चुनाव आयुक्त, के बीच टकराव की संज्ञा दे रहा है।
इस बीच उच्च न्यायालय ने निर्णय देकर एक प्रकार से चुनाव की समय सारणी ही निर्धारित कर दी है, लेकिन विवाद फिर भी थम नहीं रहा। क्या वाकई यह टकराव है या मात्र संविधान, कानून और परिस्थितियों की समझ में मतभेद? आइए, इस मुद्दे पर वैधानिक प्रविधानों को समझें और फिर इस पर अपना दृष्टिकोण बनाएं।
विवाद की उत्पत्ति है मुख्य सचिव-व-अध्यक्ष राज्य आपदा कार्यकारिणी समिति द्वारा पारित 8 अक्टूबर 2025 का आदेश जिसमे हवाला दिया है प्रदेश में आई भयंकर आपदा, उससे हुई क्षति और प्रदेश के कुछ ज़िलों के उपायुक्तों के सुझाव कि चुनाव कार्यदल और वोटरों की सुरक्षा के दृष्टिगत चुनाव तभी कराए जाएं जब सभी जगह उपयुक्त संपर्क स्थापित हो जाए।
आदेश यह पारित हुआ कि क्षतिग्रस्त सड़कों व सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को हुए नुकसान के मद्देनज़र आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 24, उपधारा (ई) द्वारा प्रद्धत शक्तियों के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव तब कराए जाएं जब पूरे प्रदेश में ठीक से संपर्क सुविधाएं स्थापित हो जाएं।
आगे तर्क यह दिया गया है कि चुनाव कर्मचारियों और स्थानीय जनता को कोई असुविधा ना हो, इसलिए ऐसा किया जा रहा है। एक बार अधिनियम की धारा 24(ई) को पढ़ लिया जाए तो विषय पर कुछ स्पष्ट समझ हो जाएगी। इस धारा का शीर्षक है ‘आपदा की आशंका की स्थिति में राज्य कार्यकारिणी समिति की शक्तियां और कार्य।’ क्या हैं यह शक्तियां और कार्य?
‘आपदा से प्रभावित समुदाय की सहायता करने और उसकी सुरक्षा करने या ऐसे समुदाय को राहत प्रदान करने या व्यवधान को रोकने या उसका मुकाबला करने या किसी आपदा की आशंका की स्थिति के प्रभावों से निपटने के प्रयोजन के लिए, राज्य कार्यकारिणी समिति……राज्य सरकार के संबंधित विभाग, किसी जिला प्राधिकरण या अन्य प्राधिकरण को राज्य की स्थानीय सीमाओं के भीतर बचाव, निकासी या जीवन या संपत्ति को बचाने के लिए तत्काल राहत प्रदान करने के लिए ऐसे उपाय या कदम उठाने का निर्देश (दे सकती है), जो उसकी राय में आवश्यक हो।’
क्या पंचायत चुनाव आड़े आ रहे हैं प्रभावित समुदाय की सहायता में? क्या पंचायत चुनाव का टालना निकासी या जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए उपयुक्त कदम है? क्या आज भी निकासी की आवश्यकता है कहीं प्रदेश में?
अब दूसरी ओर भारत का संविधान है जिसका अनुच्छेद 243(के) स्पष्टता यह कहता है कि पंचायतों के सभी चुनावों के लिए ‘मतदाता सूची तैयार करने से लेकर उनके संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण राज्य चुनाव आयोग में निहित होगा’, जिसमें राज्यपाल द्वारा नियुक्त एक राज्य चुनाव आयुक्त होगा।
अनुच्छेद 243 ही फिर समझाता है कि सरकार द्वारा राज्य चुनाव आयोग के अनुरोध पर आयोग को ऐसा स्टाफ उपलब्ध करवाया जाएगा जो ‘आयोग को सौंपे गए कार्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हो।’ अनुच्छेद 243(ई) के अनुसार “हर पंचायत.. अपनी पहली मीटिंग के लिए तय तारीख से पांच साल तक बनी रहेगी, उससे अधिक नहीं।’कृपया नोट करें ‘पांच साल’, ‘उससे अधिक नहीं।’
संविधान का यही अनुच्छेद आगे स्पष्ट करता है कि पुनः पंचायत के गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा ‘निर्धारित अवधि समाप्त होने से पहले।’ बाद में नहीं, ‘पहले।’
इस परिदृश्य में प्रश्न यह है कि चुनाव आयोग के पास क्या कोई विकल्प है? यदि है तो क्या वो संविधान और कानून के दायरे में है? क्या आपदा प्रबंधन अधिनियम के अंतर्गत प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा पारित आदेश कानूनन तर्कसंगत है?
क्या वाकई ही प्रदेश में वर्तमान परिस्थितियां आवाजाही को इस हद तक प्रभावित कर रही हैं कि कई लोग वोट ही ना डाल पाएं? यदि संविधान के प्रविधानों का अनुपालन नहीं होता तो ऐसी परिस्थिति की व्याख्या कैसे की जाएगी? समय और हालात की मजबूरी या फिर संवैधानिक व्यवस्था की विफलता?
संविधानिक और वैधानिक प्रावधानों में भ्रांति की गुंजाइश नहीं। अब तो उच्च न्यायालय ने भी व्यवस्था दे दी है।
प्रश्न यह है कि जिला के उपायुक्तों ने राज्य चुनाव आयुक्त के आदेश का अनुपालन क्यों नहीं किया? क्यों प्रदेश सरकार के संबंधित अधिकारी चुनाव आयुक्त द्वारा प्रायोजित बैठक में नहीं गए? वैधानिक प्रावधान स्पष्टत: अंकित हैं कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान चुनाव से संबद्ध सभी अधिकारी एवं कर्मचारी राज्य चुनाव आयोग के “अधीक्षण, नियंत्रण और अनुशासन” में रहेंगे। तो क्या यह दुस्साहस नहीं है?
राज्य चुनाव आयुक्त अनिल कुमार खाची प्रदेश के मुख्य सचिव रहे हैं, अतः इन सभी अधिकारियों के वरिष्ठ हैं। वह अपनी समझ अनुसार संवैधानिक मूल्यों और प्रावधानों का संरक्षण ही तो कर रहे हैं, तो सर्वत्र स्वागत होना चाहिए।
एक नियमित वैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया अनावश्यक व तर्कहीन विवाद में उलझ गई है। सुलझन सहज और सरल है; नाटक के पात्रों ने पद ग्रहण पूर्व जिस संविधान की शपथ ली है, उसी का अनुसरण करें, निष्ठा के साथ। प्रदेश के सत्ताधारी दल के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी ने कहा है, ‘पंचायती राज सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि लोगों को सशक्त बनाना है।’
(लेखक भारतीय खाद्य एवं कृषि परिषद के महानिदेशक व भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं)