मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा।
जब बाज़ार की भाषा में श्रम को लागत और मज़दूरी को बोझ कहा जाने लगे, तब यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि निशाने पर कोई योजना नहीं, बल्कि वह विचार है जो कहता है—हर हाथ को काम का अधिकार होना चाहिए। मनरेगा इसी विचार का व्यावहारिक रूप है। यह न तो दया है, न अनुदान और न ही चुनावी घूस; यह श्रमिक के श्रम का वैधानिक मूल्य है।
जिस योजना में हाथ फैलाने की नहीं, हाथ चलाने की शर्त हो—उसे “मुफ़्तखोरी” कहना न सिर्फ़ तथ्यों का अपमान है, बल्कि उस संविधान की आत्मा से भी टकराव है जो समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय को राज्य की प्राथमिक ज़िम्मेदारी मानता है। मनरेगा पर बढ़ते हमले दरअसल उस असहजता के संकेत हैं, जो तब पैदा होती है जब श्रम को अधिकार और पूँजी को विशेषाधिकार मानने की राजनीति बेनक़ाब होने लगती है।
मुफ़्तखोरी वही है, जहाँ सत्ता चुनावी मौसम में 10,000–10,000 रुपये, 5,000–5,000 रुपये या 10 किलो चावल बांटकर नागरिक को अधिकार नहीं, एहसान का आदी बनाती है। यह वह राजनीति है, जो काम देने के बजाय निर्भरता पैदा करती है, ताकि मतदाता सवाल न पूछे—सिर्फ़ आभार जताए। यही लोकतंत्र का सबसे सस्ता सौदा और सबसे महँगा नुकसान है।
इसके ठीक उलट, मनरेगा किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि भारतीय राज्य की संवैधानिक बाध्यता है। संविधान का अनुच्छेद 38 राज्य को सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने का निर्देश देता है और अनुच्छेद 41 नागरिक को काम के अधिकार की दिशा में ठोस कदम उठाने का दायित्व सौंपता है। मनरेगा इन्हीं अनुच्छेदों की ज़मीनी अभिव्यक्ति है—जहाँ नागरिक हाथ फैलाकर नहीं, हाथ चलाकर जीने का हक़ माँगता है।
“जिस योजना में श्रम की अनिवार्यता हो, उसे मुफ़्तखोरी कहना संविधान की आत्मा पर सीधा हमला है।”
विडंबना यह है कि जिस देश में कॉरपोरेट कर छूट, ऋण माफ़ी और सब्सिडी को ‘आर्थिक सुधार’ कहा जाता है, वहीं गरीब की मज़दूरी अचानक राजकोषीय बोझ बन जाती है। ऊपर से नीचे बहने वाला पैसा विकास कहलाता है, नीचे से ऊपर उठने वाला श्रम घाटा। यही वह नीतिगत असमानता है, जिसे आज की सरकार ने विकास की भाषा और अनुशासन के बहाने वैध ठहराने की कोशिश की है।
कोविड जैसे राष्ट्रीय संकट में भी जब करोड़ों मज़दूरों के लिए बाज़ार ने दरवाज़े बंद कर दिए, तब मनरेगा ही वह आख़िरी संवैधानिक सहारा बना—जिसे वर्षों तक हाशिये पर रखा गया, लेकिन संकट आते ही उसी की पूंछ पकड़कर सत्ता ने बेतरणी पार की। इसके बाद भी उसी योजना को कमजोर करना, भुगतान में देरी करना और बजट काटना—यह सिर्फ़ नीति नहीं, संवैधानिक दायित्व से पलायन है।
अंततः सवाल योजनाओं का नहीं, राज्य की मंशा का है। क्या सरकार नागरिक को अधिकारधारी बनाना चाहती है या चुनावी लाभ का उपभोक्ता? मनरेगा का बचाव किसी एक योजना का बचाव नहीं—यह संविधान के अनुच्छेद 38 और 41 में निहित उस विचार का बचाव है।
जिसमें राज्य का धर्म विकास नहीं, न्याय है; और नागरिक की पहचान लाभार्थी नहीं, श्रमशील नागरिक है। जो सरकार इस फर्क को मिटाती है, वह सिर्फ़ मनरेगा नहीं काटती—वह लोकतंत्र की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाती है।
-लेखक हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं ग्राम परिवेश पत्रिका के संपादक हैं।