मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा।
कानून के कटघरे में यदि किसी राज्य की पुलिस बिना समुचित सूचना, विधिक संवाद और प्रशासनिक समन्वय के दूसरे राज्य की सीमा में प्रवेश कर कार्रवाई करती है, तो वह केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं रह जाती—वह भारतीय संघीय ढांचे की आत्मा को स्पर्श करने वाला प्रश्न बन जाती है।
संविधान की राज्य सूची में “पुलिस” स्पष्टतः राज्यों के अधिकार-क्षेत्र का विषय है; अतः अंतर-राज्यीय गिरफ्तारी या छापेमारी के समय परस्पर सूचना, स्थानीय प्रशासन से समन्वय और विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन संघीय शिष्टाचार का अनिवार्य अंग है।
यदि यह तथ्य प्रमाणित होता है कि दिल्ली पुलिस ने बिना पूर्व सूचना के कार्रवाई की, तो यह प्रश्न केवल तकनीकी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि राज्यों के परस्पर सम्मान का भी है। कानून का शासन—Rule of Law—व्यक्ति और दल से ऊपर होता है; और जब विधिक सीमाओं को लांघकर शक्ति-प्रदर्शन प्राथमिकता बन जाए, तो संघीय संतुलन की रेखाएँ धुंधली पड़ने लगती हैं।
ऐसी स्थिति में विशेषकर हिमाचल प्रदेश भाजपा को आत्ममंथन करना होगा कि क्या प्रदेश की संस्थागत गरिमा और “हिमाचलियत” की अस्मिता को बार-बार केंद्रीय सत्ता की अनुकूलता के आगे गौण रखा गया है? क्या संघीय मर्यादाएं केवल तब स्मरण होती हैं जब राजनीतिक समीकरण प्रतिकूल हों, और अनुकूल समय में विस्मृत?
विस्मृति सुविधाजनक हो सकती है, पर इतिहास निष्पक्ष रहता है। फरवरी 2023 की वह घटना अभी भी जनस्मृति में ताज़ा है, जब हरियाणा पुलिस के साथ कांग्रेस के छह बागी विधायक हिमाचल विधानसभा परिसर तक पहुँचे और बूम बैरियर तोड़े जाने के दृश्य सार्वजनिक हुए। तब न संघीय शिष्टाचार का शोर था, न प्रक्रिया की पवित्रता पर विमर्श।
इसी क्रम में भाजपा तेजिंदर सिंह बग्गा का प्रकरण भी उल्लेखनीय है, जब पंजाब, दिल्ली और हरियाणा पुलिस के बीच अधिकार-क्षेत्र को लेकर खुला टकराव सामने आया। उस समय भी “राज्याधिकार” और “संवैधानिक मर्यादा” की व्याख्या राजनीतिक सुविधा के तराजू पर तौली जाती दिखी।
आज यदि हिमाचल प्रदेश पुलिस की कार्रवाई पर नैतिकता का मंच सजाया जा रहा है, तो यह दोहरे मानदंड की स्पष्ट झलक देता है—सत्ता अनुकूल हो तो आक्रामकता “रणनीति”, और प्रतिकूल हो तो वही आचरण “संवैधानिक संकट”।
हिमाचल की संवैधानिक गरिमा किसी दल की बपौती नहीं। राज्याधिकार की सीमाएँ यदि बार-बार राजनीतिक सुविधा से परिभाषित होंगी, तो यह केवल एक घटना नहीं रहेगी—यह संघीय ढांचे में विश्वास की दरार बनेगी। और लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता की स्मृति करती है; वह सिद्धांत और अवसरवाद के अंतर को भलीभांति पहचानती है।
:- लेखक हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार व ग्राम परिवेश पत्रिका के संपादक हैं।