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सैंज, (कुल्लू), करंट न्यूज़ : कोठी ब्रह्मगढ़ क्षेत्र में आयोजित होने वाला पड़ैई मेला हिमाचल की समृद्ध देव संस्कृति का अनूठा प्रतीक है। यह ऐतिहासिक मेला देवी चैलाशन को समर्पित है और हर दस वर्ष बाद आयोजित किया जाता है। मेले में क्षेत्र के करीब 10 गांवों की सामूहिक सहभागिता रहती है।

जुआगी निवासी पूर्व फौजी एल आर ठाकुर, ठारला निवासी निर्मल सोनी एवं फौजी भोपेन्द्र ब्रामटा ने बताया कि जाओं, ठारला, जोवा, ढमार, वघीर, कलौंट, जरोट, सगोफा, दवाह, कलोटी, तिंदर और जुआगी में पड़ैई आयोजन की परंपरा जुड़ी है। दस वर्ष के अंतराल के बाद होने के कारण मेले का स्थानीय लोगों में विशेष धार्मिक महत्व है।

देव नृत्य और पारंपरिक अनुष्ठानों से गूंजा क्षेत्र

मेले में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के साथ पारंपरिक देव अनुष्ठान किए जाते हैं। देव नृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनें मेले के मुख्य आकर्षण रहीं। देवी की शोभायात्रा और प्रस्थान यात्रा भी धार्मिक आस्था का प्रमुख हिस्सा बनीं।

‘भोज नृत्य’ सहित कई पारंपरिक रस्में मेले की सांस्कृतिक पहचान हैं। मिट्टी के कलशों में विशेष धार्मिक सामग्री लाने की परंपरा भी आयोजन को विशिष्ट बनाती है।

भुंडा प्रथा और समुद्र मंथन से जुड़ी मान्यताएं

पड़ैई मेले का संबंध प्राचीन भुंडा प्रथा से भी बताया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पहले क्षेत्र में भुंडा प्रथा के तहत विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए जाते थे। बाद में देवी के आदेश के अनुसार परंपरा में बदलाव आया और पड़ैई मेले का वर्तमान स्वरूप सामने आया।

मेले की धार्मिक मान्यताओं को समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय परंपरा में अमृत कलश की स्मृति को मेले की धार्मिक मान्यताओं से संबंधित माना जाता है।

सामाजिक एकता का प्रतीक बना पड़ैई मेला

पड़ैई मेला क्षेत्र के गांवों की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक सहभागिता का भी प्रतीक है। पीढ़ियों से चली आ रही देव परंपराओं को स्थानीय लोग आज भी पूरी श्रद्धा से आगे बढ़ा रहे हैं।

हर दस वर्ष बाद होने वाला यह आयोजन देवभूमि की प्राचीन संस्कृति और लोक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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