टीना ठाकुर।
शिमला : एक दौर था जब हिमाचल में पत्रकार की पहचान उसकी खबर से होती थी। लोग अखबार की एक-एक लाइन को गंभीरता से लेते थे, क्योंकि खबर प्रकाशित होने से पहले तथ्यों की गहराई से जांच की जाती थी।
आज सोशल मीडिया के दौर में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। हर हाथ में मोबाइल और सोशल मीडिया ने सूचना साझा करना बेहद आसान बना दिया है। यानी हर कोई पत्रकार और हर व्यक्ति के पास सूचना साझा करने का मंच। नतीजा सोशल मीडिया पर बिना पुष्टि किए और बिना तथ्यों के खबर ब्रेक करने की होड़। कई बार तो ये सीधा फैसला सुना देते हैं।
परिणामस्वरूप लोग बिना पूरी खबर जाने सिर्फ हेडलाइन देखकर ही अपनी राय कायम कर लेते हैं– और शुरू हो जाता है कमेंट बॉक्स में पत्रकार को ‘बिकाऊ’ या ‘एजेंट’ जैसे टैग देने का सिलसिला।
दरअसल आज की पत्रकारिता में खबर को सबसे पहले चलाने की होड़ चल रही है, जिसके चलते अकसर सच्चाई और तथ्यों की पुष्टि कहीं पीछे छूट जाती है। फेसबुक और यूट्यूब चैनलों की इस अंधी दौड़ में कई बार भ्रामक वीडियो और पुरानी तस्वीरें ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनकर सामने आती हैं, जो पत्रकारिता के साथ-साथ समाज के लिए भी खतरनाक हैं।
इसी बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब असली और नकली के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया है, क्योंकि तकनीक का इस्तेमाल एजेंडा चलाने और फेक नैरेटिव गढ़ने के लिए किया जा रहा है। ऐसे में यह जरूरी है कि तकनीक के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हो।
यह कड़वा सच है कि कुछ लोग सनसनी फैलाकर पूरे पेशे की साख को नुकसान पहुंचा रहे हैं, मगर चंद लोगों की वजह से हर पत्रकार की नीयत पर सवाल उठाना भी गलत है। सोशल मीडिया का सही उपयोग भी हो रहा है जैसे–दूरदराज क्षेत्रों की समस्याएं अब तेजी से सामने आती हैं। आम जनता भी स्थानीय मुद्दों को उठाने लगी है, कई फ्रीलांस जर्नलिस्ट डिजिटल माध्यम से अच्छा काम भी कर रहे हैं।
लब्बोलुआब ये कि अगर लोग हर खबर को बिना पढ़े खारिज करने लगेगा, तो धीरे-धीरे सच बोलने वाली आवाजें खामोश होने लगेंगी। समझना जरूरी है कि लोकतंत्र में पत्रकार का सवाल पूछना बेहद जरूरी है– क्योंकि जिस दिन पत्रकार खामोश हो जाएगा, उस दिन जनता का जवाब मांगने का अधिकार भी खतरे में पड़ जाएगा।
:- टीना ठाकुर हिमाचल प्रदेश की वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ ही ब्राइट न्यूज की राज्य ब्यूरो हैं। उनकी फेसबुक वॉल से साभार।