धर्मचंद यादव,
संपादक, करंट न्यूज़।
हालांकि एचआरटीसी से सेवानिवृत्ति व तैनात कर्मचारियों के साथ दशकों से यह भेदभाव का रवैया लगभग हर सरकार द्वारा अपनाया जाता रहा है। उन्हें अपना वेतन, भत्ते व पेंशन लेने के लिए अक्सर हड़ताल व आंदोलन की धमकी सरकार को देनी पड़ती है। तब जाकर उन्हें वेतन और पेंशन मिलती है।
जबकि यही वह कर्मचारी हैं जो दिन रात सेवाएं देते हुए लोगों को अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। चाहे त्यौहार हो या घर में कोई बीमार हो या कोई आवश्यक काम हो या खुद अस्वस्थ हों लेकिन इनका ड्यूटी के प्रति आवागमन और कर्तव्य निष्ठा में कोई फर्क नहीं पड़ता है।
लगातार देश के दूर-दराज स्थान से लेकर दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों तक बसों के माध्यम से लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचने में डटे रहते हैं। मगर इसके बावजूद जब उन्हें वेतन, भत्ते और पेंशन देने की बात आती है तो सरकार वहां अपने हाथ खड़े कर देती है। लगातार बहानेबाजी शुरू हो जाती है।
कई बार पेंशनर तो दूर नियमित कार्यरत कर्मचारियों को भी वेतन के लाले पड़ जाते हैं। जबकि पेंशनर की तो एचआरटीसी प्रबंधन व सरकार में कोई पूछ ही नहीं होती है। उन्हें तो हर महीने पेंशन पाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। वैसे यह स्थिति इन कर्मचारियों के साथ पूर्व सरकारों के समय भी ऐसी ही थी। लेकिन जितनी दुर्गति इनकी इस सरकार के कार्यकाल में हो रही है, उतनी दुर्गति इनकी किसी भी सरकार के कार्यकाल में नहीं हुई है।
हालांकि नियमित कर्मचारियों को तो जैसे तैसे हड़ताल की धमकी-धुमकी देकर वेतन का भुगतान हर महीने 10-15 दिन बाद हो ही जाता है। लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव में पहुंच चुके एचआरटीसी के पेंशनर लड़खड़ाते कदमों से चलते हुए व कंपकपाते हाथों में पेंशन व मेडिकल बिलों के कागज लेकर सड़कों पर भटकने के लिए विवश हो गए हैं।
पोते पोतियो संग खेलने की इस उम्र में इन बुजुर्ग हो चुके पेंशनरों को कई-कई महीने पेंशन नहीं मिल पा रही है। न ही इन्हें मेडिकल बिलों का भुगतान हो रहा है। पेंशन व मेडिकल बिल का भुगतान न होने की वजह से इन पेंशनरों को अपना उपचार करवाने में भी खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बल्कि कई पेंशनर तो उपचार करवाने को पैसा न होने की वजह से चल बसे।
लेकिन सरकार व एचआरटीसी प्रबंधन इन बुजुर्ग कर्मचारियों की पीड़ा को समझने का प्रयास नहीं कर रही है। अपनी ही पेंशन व अन्य भत्तों के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। यह बुजुर्ग पेंशनर कर्मचारी टकटकी लगाए सरकार की तरफ ताकते रहते हैं कि कब सरकार उनके दर्द को समझते हुए उन्हें समय पर पेंशन व भत्ते जारी करेगी। लेकिन सरकार है कि लगातार उन्हें झूठे वादों से बहलाने का प्रयास करते हुए महज लॉलीपॉप ही थमाती आ रही है।
एचआरटीसी पेंशनर कर्मचारियों की माने तो सरकार पर 1200 करोड़ की देनदारी एचआरटीसी कर्मचारियों की ही है। लेकिन मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री बड़े-बड़े कार्यक्रमों में एचआरटीसी व कर्मचारियों के संवर्धन की बड़ी-बड़ी घोषणाएं तो कर देते हैं। लेकिन वह धरातल पर कहीं भी नहीं उतर पाती है। ऐसे में यह बुजुर्ग सेवानिवृत कर्मचारी बेहद ही तकलीफ में अपना गुजर बसर कर रहे हैं।
सरकार के पास बार-बार गुहार लगाने के बावजूद भी उनकी दिक्कतों को किसी भी स्तर पर नहीं समझा जा रहा है। उन्हें हर महीने सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जबकि उनकी उम्र सड़क पर उतरकर संघर्ष करने की नहीं, बल्कि बाल बच्चों के साथ घर में बैठकर आराम करने का समय है।
क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी एचआरटीसी के लिए समर्पित की है। जिन में कोई दिन रात बसों में लोगों को पहुंचाने का काम करने वाले हैं तो कोई वर्कशॉप में दिनभर काले पीले हाथ मुंह लेकर बसों की मरम्मत में जुटे रहने वाले हैं। जो अब उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच गए हैं कि उन्हें अब निश्चित तौर पर आराम की आवश्यकता है। उन्हें अपने परिवार संग बैठने की आवश्यकता है। क्योंकि नौकरी के दौरान यह लगातार अपने परिवार से दूर रहते हुए लोगों की सेवा में जुटे रहे। मगर इस पड़ाव में भी सरकार उन्हें घर से बाहर निकाल कर सड़कों में उतरने के लिए विवश कर रही है।
हालांकि मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री ने कई बार इन कर्मचारियों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए बड़ी-बड़ी घोषणाएं जरूर की। मगर वह महज घोषणाएं ही साबित हुई, घोषणाओं से बाहर निकाल कर कुछ भी सार्थक नहीं हो पाया। ऐसे में यह कर्मचारी अपने को पूरी तरह से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
हैरत तो इस बात की है कि प्रदेश सरकार दूसरे विभागों के कर्मचारियों व पेंशनरों को तो समय पर वेतन व पेंशन जारी कर रही है। केवल एचआरटीसी के सेवानिवृत्ति व नियमित तैनात कर्मचारियों के साथ ही भेदभाव की नीति अपनाई जा रही है। उन्हें वेतन व पेंशन सहित अन्य भत्ते जारी करने में भी बहाने बाजी की जाती है, लंबे समय तक उन्हें वेतन और पेंशन नहीं मिलती है। जबकि दूसरे कर्मचारियों को लगभग हर माह 1 से 5 तारीख के बीच में वेतन व पेंशन मिल जाती है।
तो ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सरकार एचआरटीसी के पेंशनरों व कर्मचारियों के साथ इस तरह का भेद भावपूर्ण रवैया क्यों अपना रही है? उनकी तकलीफों और उनकी जरूरत को सरकार क्यों दरकिनार करती आ रही है?
यह सवाल अपने आप में बेहद तकलीफ देने वाला है कि जो कर्मचारी दिन रात परिवार से दूर रहकर सरकार व जनता की सेवा में जुटे रहने के बाद सेवानिवृत होकर घर आते हैं, तो उन्हें न तो पेंशन समय पर मिल पाती है और न ही उन्हें अन्य भत्तों का भुगतान समय पर किया जाता है। जिससे परिवार में भी उनकी स्थिति दयनीय पूर्ण हो जाती है। लेकिन सरकार कब समझेगी यह सवाल मुँहबाये खड़ा है?
कल भी जारी…..।