कुल्लू, करंट न्यूज : हिमाचल प्रदेश की वादियों में मनाया जाने वाला कुल्लू दशहरा विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है बल्कि सांस्कृतिक धरोहर और लोक परंपराओं का भी प्रतीक है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कहा जाता है कि 17वीं शताब्दी में कुल्लू के राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ जी को अपना इष्ट देव मानकर उन्हें राज्य का स्वामी घोषित किया। तभी से दशहरे के अवसर पर भगवान रघुनाथ जी की शोभायात्रा और उत्सव की परंपरा शुरू हुई।
विशेषता
भारत के अन्य हिस्सों में दशहरा जहां रावण दहन के रूप में मनाया जाता है, वहीं कुल्लू दशहरा की अलग पहचान है। यहाँ रावण दहन नहीं होता, बल्कि भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा, देवताओं का मिलन और सांस्कृतिक कार्यक्रम उत्सव का मुख्य आकर्षण होते हैं।

आयोजन
यह पर्व विजयदशमी से शुरू होकर सात दिनों तक चलता है।
कुल्लू घाटी के विभिन्न मंदिरों से लगभग 300 से अधिक देवता अपनी-अपनी पालकियों सहित भाग लेते हैं।
ढोल-नगाड़ों और लोकनृत्यों के बीच रघुनाथ जी की शोभायात्रा पूरे शहर का माहौल भक्तिमय बना देती है। देश-विदेश से हजारों पर्यटक इस आयोजन को देखने आते हैं।

सांस्कृतिक महत्व
कुल्लू दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भाईचारे, एकता और संस्कृति का पर्व है। लोक कलाकार नृत्य, गीत और नाट्य प्रस्तुतियाँ करते हैं जो हिमाचली संस्कृति की झलक दुनिया के सामने रखते हैं।
कुल्लू दशहरा हिमाचल की वादियों में आस्था, संस्कृति और पर्यटन का अद्वितीय संगम है। यह पर्व न सिर्फ भगवान रघुनाथ जी की महिमा का गुणगान करता है, बल्कि पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति की अनोखी झलक दिखाता है।