SIR की खूनी तलवार, स्याही लगी उंगलियों की माला और दिनकर की चेतावनी – जब संस्थाएं ही करने लगें विवेक का हनन, तो क्या बचेगा लोकतंत्र?
हेमसिंह ठाकुर
संविधान सभा के हॉल में टंगे उन महानुभावों के चित्रों को देखना आज भी एक अजीब सी सिहरन पैदा करता है, जिन्होंने इस देश के हर अंतिम व्यक्ति को ‘एक वोट, एक मूल्य’ का अधिकार दिया था। पर आज चुनाव आयोग के गलियारों में जो छाया तैर रही है, वह किसी संरक्षक की नहीं, बल्कि एक आशंकित भय की प्रतीत होती है।
हाल ही में राजनीतिक व्यंग्यकारों और कार्टूनिस्टों ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को एक नया रूपक दिया है—’अंगुलिमाल’। वही प्राचीन कथाओं का कुख्यात डाकू, जो राहगीरों की उंगलियां काटकर उनकी माला पहना करता था। फर्क सिर्फ इतना है कि आज के इस आधुनिक रूपक में कटी हुई उंगलियों पर ‘चुनावी स्याही’ (Electoral Ink) के नीले निशान रंगे हुए हैं। गले में लटकी यह माला वास्तव में उन करोड़ों नागरिकों की आवाज़ का प्रतीक है, जिनका वोट देने का अधिकार प्रशासनिक फाइलों के नीचे दबा दिया गया है।
हाथ में ‘SIR’ (Special Intensive Revision / विशेष गहन पुनरीक्षण) लिखी हुई खून से सनी तलवार इस बात का तीखा संकेत है कि जो प्रक्रिया मतदाता सूची को पारदर्शी और सही बनाने के लिए शुरू की गई थी, वह अब जन-अधिकारों पर चलने वाला एक हथियार बन चुकी है।
मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण के नाम पर जिस तरह लाखों नागरिकों के नाम रातों-रात सूची से गायब हो रहे हैं, उसने लोकतंत्र की बुनियादी नींव—’जनता के भरोसे’—को हिलाकर रख दिया है।
तटस्थता और निष्पक्षता की कुर्सी पर बैठकर आक्रामकता और बेरुखी दिखाना केवल एक अधिकारी का रवैया नहीं, बल्कि एक संवैधानिक संस्था के अवमूल्यन का संकेत है।
जब संस्थाएं जनता के प्रति जवाबदेह होने के बजाय अपनी शक्ति का दंभ भरने लगती हैं, तब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ये पंक्तियां स्वतः याद आती हैं:
“जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।”दिनकर जी ने लिखा था कि सत्ता का विवेकहीन होना ही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा संकट है। बुद्ध की धरती पर अंगुलिमाल का प्रसंग हमें यह भी याद दिलाता है कि हिंसा, दमन और अधिकारों का हनन कभी स्थाई नहीं हो सकता।
जब बुद्ध अंगुलिमाल के सामने पहुंचे थे, तो उन्होंने तलवार छीनने के लिए कोई बलप्रयोग नहीं किया था; उन्होंने केवल आत्म-विवेक और सत्य का दर्पण दिखाया था, जिससे अंगुलिमाल का अहंकार टूटकर गिर गया था।
आज भारतीय लोकतंत्र भी ऐसे ही एक मोड़ पर खड़ा है। चुनाव आयोग कोई ऐसी प्रशासनिक शाखा नहीं है जिसे तलवार चलाकर नाम छांटने का काम सौंपा गया हो। इसका मुख्य दायित्व हर नागरिक के वोट के अधिकार की रक्षा करना है। मतदाता सूची के ‘पुनरीक्षण’ के नाम पर नागरिकों को मताधिकार से वंचित करना लोकतंत्र के साथ एक आत्मघाती प्रयोग है।
समय आ गया है कि चुनाव आयोग अपने हाथ में थमी इस ‘संशोधन की तलवार’ को नीचे रखे और यह याद करे कि उसका असली काम मतदाता के अधिकार का संरक्षण करना है, न कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भय और संदेह के घेरे में धकेलना। – उसका असली धर्म डराना नहीं, भरोसा जगाना है।
:- लेखक हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला के गोहर से सम्बन्ध रखते हैं। वह पेशे से वकील हैं और पत्रकारिता के साथ लेखन में भी दक्षता रखते हैं।