मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा
लगभग एक वर्ष से ज्यादा समय से हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की संगठनात्मक रचना अधर में लटकी हुई है। प्रदेश कार्यकारिणी से लेकर जिलाध्यक्षों की नियुक्तियां तक-.कभी विभिन्न राज्यों के चुनावी दबाव में, कभी आपदा प्रबंधन की प्राथमिकताओं में, तो कभी पार्टी प्रभारी के फेरबदल में उलझी रहीं।
लेकिन स्वर्गीय वीरभद्र सिंह की प्रतिमा के अनावरण के बाद प्रदेश की राजनीतिक फिज़ा में अचानक बदलाव महसूस किया जा रहा है। अब कयासों का सिलसिला महज़ हवा नहीं, बल्कि ठोस संकेतों पर टिका माना जा रहा है कि बहुत जल्द हिमाचल कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिलने जा रहा है।
प्रतिमा अनावरण के तुरंत बाद दिल्ली का रास्ता पकड़ने वाले नेताओं की सक्रियता इस नए समीकरण की गवाही दे रही है। सोशल मीडिया पर नेताओं की दिल्ली मौजूदगी की तस्वीरें और राजनीतिक हलकों में चली खबरों ने इस चर्चा को और गाढ़ा कर दिया है।
इन अटकलों के बीच दो नाम प्रमुखता से उभर कर सामने आए हैं। शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर, जो निर्विवाद की राजनीति का संतुलित चेहरा माने जाते हैं, ने नई भूमिका स्वीकारने की बात भी मीडिया में की है।
दूसरी ओर, प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल का झुकाव पूर्व अध्यक्ष व विधायक कुलदीप सिंह राठौर के पक्ष में दिख रहा है। बताया जा रहा है कि राठौर भी इन संकेतों के बीच दिल्ली में डेरा डाल चुके हैं।
हालांकि यह जंग केवल दो नामों तक सीमित नहीं है। अनुसूचित जाति वर्ग से जुड़े कई विधायक और नेता इस बार संगठन में प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर दिल्ली में सक्रिय हैं। हाल में दलितों के साथ हुई कुछ घटनाओं ने उनके तर्क को राजनीतिक वजन प्रदान किया है। इनमें से कई नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष ’’मल्लिकार्जुन खड़गे’’ से भेंट कर अपना पक्ष सीधे तौर पर रखा है।
इसी बीच, मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू का भी दिल्ली दौरा इस समीकरण में नया आयाम जोड़ रहा है। सुक्खू अपने राजनीतिक स्वभाव के अनुरूप अब तक किसी नाम की खुली पैरवी से बचे हुए हैं।
किंतु यह सर्वविदित है कि वे अपनी पसंद आखिरी क्षणों में ही जाहिर करते हैं और उनके संकेत को ‘दिल्ली दरबार’ हल्के में नहीं लेता। पार्टी सूत्रों का मानना है कि हाईकमान इस बार भी सुक्खू की राय को निर्णायक अहमियत देगा।
इस प्रकार, हिमाचल कांग्रेस की नई कमान अब केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि दलित प्रतिनिधित्व, सुक्खू समीकरण और वीरभद्र स्कूल आफ थॉट के बीच संतुलन साधने की एक कठिन राजनीतिक परीक्षा बन गई है।
आने वाले कुछ ही दिनों में स्पष्ट होगा कि प्रदेश कांग्रेस का भविष्य किस ध्रुव के इर्द-गिर्द पुनर्गठित होता है-“शक्ति संतुलन” या “संगठन अनुशासन” के आधार पर।
-लेखक हिमाचल प्रदेश के वरिष्ट पत्रकार के साथ ही ग्राम परिवेश पत्रिका के संपादक हैं।