थुनाग (मंडी), करंट न्यूज़ : सायर सक्रांति के पावन पर्व पर सराज घाटी भक्ति और आस्था में डूब गई। एक माह के दिव्य प्रवास के बाद सराज के अधिष्ठाता देव शैटीनाग अपने मूल स्थल शैटाधार लौट आए।
देवता के आगमन पर 10 हजार से अधिक श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा और ‘जय देव शैटीनाग’ के उद्घोष के साथ भक्तों ने अखरोटों (स्थानीय भाषा में द्रुभ) की बौछार कर अपने आराध्य का भव्य स्वागत किया।

देवता के मुख्य कारदार हिम्मत राम ठाकुर ने बताया कि सायर के दिन चारों दिशाओं में अखरोट फेंकने की यह परंपरा सदियों पुरानी और बेहद पवित्र है।
मान्यता है कि इस दिव्य अनुष्ठान से क्षेत्र की समस्त नकारात्मक शक्तियां, बाधाएं और संकट दूर हो जाते हैं और पूरे क्षेत्र में सुख-समृद्धि, खुशहाली और अच्छी फसल का आशीर्वाद बरसता है।
बेटियों की घर वापसी का शुभ संकेत
सायर का यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। परंपरा के अनुसार शादी के बाद एक माह से मायके में रह रही नवविवाहित बेटियां इसी दिन कपाट खुलने पर अपने ससुराल लौटती हैं।

यह दिन ससुराल में नए जीवन की मंगल शुरुआत का माना जाता है। मेले में पारंपरिक भैंसों और बैलों की भिड़ंत ने पहाड़ी संस्कृति की जीवंत झलक पेश की।
पौराणिक रहस्य : हंसकुंड महाराज हैं शैटीनाग

पौराणिक कथा के अनुसार देव शैटीनाग का मूल स्वरूप हंसकुंड महाराज है। मान्यता है कि वे ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क स्थित पवित्र हंसकुंड से चलकर शैटाधार में विराजमान हुए थे।
आज भी उनकी महिमा अटूट है और सायर के दिन उनके दर्शन मात्र से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।