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शिमला।

दिल्ली से सिर्फ लौटकर नहीं आई, कुछ जरूरी सवाल साथ लेकर लौटी हूँ। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय पत्रकार संवाद में शामिल होना केवल एक कार्यक्रम का हिस्सा बनना नहीं था, बल्कि ऐसा अनुभव रहा जिसने मुझे एक पत्रकार, एक महिला और एक नागरिक तीनों रूपों में बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया।

इस संवाद में महिला अधिकारों, महिला अपराधों, मीडिया की भूमिका और समाज की जिम्मेदारी पर कई गंभीर और जरूरी बातें सामने आईं।

सबसे गहरी बात जो मन में बैठ गई, वह यह है कि महिलाओं से जुड़ी हर खबर केवल एक खबर नहीं होती। वह किसी की गरिमा, किसी का दर्द, किसी की चुप्पी, और किसी के पूरे जीवन से जुड़ी होती है। कई बार किसी महिला के साथ हुआ अपराध जितनी चोट नहीं पहुंचाता, उससे कहीं ज्यादा नुकसान समाज की सोच, असंवेदनशील भाषा और समाचार की गैर-जिम्मेदार प्रस्तुति पहुंचा देती है।

हम मीडिया में हैं, इसलिए यह आत्ममंथन और भी जरूरी है कि क्या हम केवल खबर लिख रहे हैं या अनजाने में किसी पीड़ित महिला को दूसरी बार समाज के कटघरे में खड़ा कर रहे हैं? एक हेडिंग, एक शब्द, एक लाइन….कई बार किसी महिला के जीवन पर बहुत भारी पड़ सकती है।

महिला से जुड़ा अपराध केवल एक घटना नहीं होता, वह उसके सम्मान, मानसिक स्थिति, सामाजिक पहचान और भविष्य से जुड़ा सवाल होता है और जब ऐसे मामलों को सनसनी, गॉसिप या सतही नजर से देखा जाता है तो न्याय की जगह समाज में एक और चुप्पी पैदा होती है।

लेकिन इस पूरे विमर्श का एक और बड़ा सच भी है कि महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई केवल सामाजिक नहीं, राजनीतिक भी है। जब तक महिलाएं नीति निर्माण, निर्णय प्रक्रिया, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के केंद्रों में बराबरी से शामिल नहीं होंगी, तब तक महिला सशक्तिकरण की बात अधूरी ही रहेगी।

महिलाओं के मुद्दों पर सबसे ज्यादा भाषण होते हैं, लेकिन निर्णय लेने वाली मेज़ पर सबसे कम महिलाएं दिखाई देती हैं। यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। महिलाओं को केवल सुरक्षा का वादा नहीं चाहिए, उन्हें चाहिए, सम्मानजनक स्वतंत्रता, संवेदनशील समाज, जिम्मेदार मीडिया और निर्णय में बराबरी की हिस्सेदारी।

दिल्ली से लौटते हुए मन में एक बात और ज्यादा साफ होकर बैठ गई है कि महिलाओं पर बात कम, महिलाओं को निर्णय के केंद्र में जगह ज्यादा देनी होगी। क्योंकि जब महिला नीति में होगी, तभी न्याय ज़मीन पर दिखेगा। जब महिला निर्णय में होगी, तभी समाज सचमुच संवेदनशील होगा और जब महिला गरिमा को केंद्र में रखकर पत्रकारिता होगी, तभी लोकतंत्र अपने सही अर्थों में मजबूत होगा।

महिला मुद्दों पर संवेदनशीलता कोई ‘option’ नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

:- टीना ठाकुर हिमाचल प्रदेश की वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह शिमला से आदर्श हिमाचल का संपादन भी करती हैं। उनकी फेसबुक वॉल से साभार।

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